
सरायकेला – गुरुवार को सरायकेला के ऐतिहासिक गुंडिचा मंदिर में आस्था, परंपरा और सनातन संस्कृति का एक अनूठा संगम देखने को मिला। रथ यात्रा उत्सव के पावन अवसर पर मंदिर परिसर भगवान के जयकारों से गूंज उठा। आज मुख्य आकर्षण महाप्रभु श्री जगन्नाथ और उनके बड़े भाई बलभद्र का अलौकिक रूप रहा, जिसे देखने के लिए सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी।अलौकिक स्वरूप के दर्शनउत्सव के दौरान महाप्रभु श्री जगन्नाथ ने भगवान विष्णु के दशावतार मत्स्य तथा उनके बड़े भाई बलभद्र ने कच्छप (कूर्म) अवतार का दिव्य रूप धारण किया। बहन सुभद्रा के साथ विराजमान भगवान के इस भव्य और अलौकिक स्वरूप की एक झलक पाने के लिए भक्त लालायित दिखे। पूरा मंदिर परिसर “जय जगन्नाथ” के उद्घोष से भक्तिमय और ऊर्जावान हो उठा।सनातन संस्कृति के अनुसार भगवान विष्णु के इन दो महा-अवतारों की महिमा सरायकेला में दिखे भगवान के इन रूपों के पीछे गहरी पौराणिक मान्यताएं छिपी हैं, जो मानव सभ्यता और धर्म की रक्षा का संदेश देती हैं । मत्स्य अवतार: वेदों के रक्षक और प्रलय के उद्धारक हिंदू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मत्स्य अवतार भगवान विष्णु का दशावतार में प्रथम अवतार माना जाता है।महाप्रलय की कथा: जब पृथ्वी पर महाप्रलय आया और सब कुछ जलमग्न होने लगा, तब सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी निद्रालीन थे। इसी का फायदा उठाकर ‘हयग्रीव’ नामक दैत्य ने पवित्र वेदों को चुरा लिया और समुद्र की अगाध गहराइयों में छुपा दिया।सृष्टि की रक्षा: धर्म की पुनर्स्थापना के लिए भगवान विष्णु ने एक विशालकाय स्वर्ण मछली (मत्स्य) का अवतार लिया। उन्होंने राजा वैवस्वत मनु, सप्तऋषियों, संसार के दुर्लभ जीवों और अनाजों को सुरक्षित रखने के लिए एक विशाल नौका का मार्गदर्शन किया। इसी रूप में भगवान ने हयग्रीव का वध किया और वेदों को सुरक्षित वापस लाकर धर्म को बचाया।
कच्छप (कूर्म) अवतार समुद्र मंथन के महा-आधारभगवान विष्णु का दूसरा अवतार ‘कच्छप’ या ‘कूर्म’ (कछुआ) अवतार कहलाता है, जो धैर्य और स्थिरता का प्रतीक है। समुद्र मंथन के समय देवताओं और असुरों ने मिलकर अमृत प्राप्ति के लिए क्षीरसागर के समुद्र मंथन का ऐतिहासिक निर्णय लिया। इस महा-मंथन के लिए मंदराचल पर्वत को मथनी (मथने की लाठी) और वासुकि नाग को रस्सी बनाया गया। मंथन शुरू होते ही मंदराचल पर्वत के नीचे कोई ठोस आधार न होने के कारण वह समुद्र में डूबने लगा। सृष्टि के इस संकट को टालने के लिए भगवान विष्णु ने एक विशाल कछुए का रूप धारण किया। वे समुद्र के भीतर गए और मंदराचल पर्वत को अपनी विशाल पीठ पर संभाल लिया। इसी दिव्य आधार के कारण समुद्र मंथन सफलतापूर्वक संपन्न हो सका और देवताओं को अमृत की प्राप्ति हुई।

महापर्व के इस दुर्लभ मत्स्य कच्छप रूप के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी है।

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