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सरायकेला : चांडिल डैम में 13 करोड़ की कथित गड़बड़ी का मामला गरमाया, जांच समिति के सामने उठे तीखे सवाल, फाइलें रांची ले गई टीम* *116 गांव प्रभावित फिर विकास सिर्फ 43 में क्यों, मास्टर कार्ड किसके कब्जे में है, मृत व्यक्ति के नाम पर भुगतान कैसे हुआ, हेवेन गांव पर टिकी निगाहें*

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BySubhasish Kumar

Oct 31, 2026
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सरायकेला : चांडिल बांध (सुवर्णरेखा बहुद्देशीय परियोजना) के विस्थापितों के पुनर्वास, विकास, मुआवजा एवं रोजगार से जुड़े वर्षों से लंबित मामलों को लेकर शुक्रवार को जल संसाधन विभाग, झारखंड सरकार द्वारा गठित पांच सदस्यीय जांच समिति के समक्ष गोल्डन व्यू रिसोर्ट, आईबी डैम कॉलोनी, घोड़ानेगी में सुनवाई हुई।
जांच समिति की अध्यक्ष एवं जल संसाधन विभाग की अपर सचिव आर. रॉनिटा के समक्ष जिला परिषद उपाध्यक्ष मधुश्री महतो, विस्थापित अधिकार मंच फाउंडेशन के राकेश रंजन महतो तथा विस्थापित मुक्ति वाहिनी के अंबिका यादव ने विस्थापितों की समस्याओं, कथित वित्तीय अनियमितताओं और पुनर्वास कार्यालय की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए।
*जिला परिषद उपाध्यक्ष मधुश्री महतो ने उठाए पांच बड़े सवाल*
*1. पुनर्वास की जमीन आज तक विभाग के नाम हस्तांतरित क्यों नहीं हुई?*
चांडिल जलाशय से विस्थापित परिवारों के पुनर्वास के लिए अधिग्रहित जमीन आज तक संबंधित विभाग को विधिवत हस्तांतरित नहीं की गई है। अंचल के पंजी-2 में भी इसका समुचित संधारण नहीं हुआ है। आखिर इतने वर्षों बाद भी जमीन का कानूनी रिकॉर्ड दुरुस्त क्यों नहीं किया गया?
*2. 116 गांव प्रभावित, फिर विकास केवल 43 गांवों में क्यों?*
जब परियोजना से कुल 116 गांव प्रभावित हुए हैं, तो विकास योजनाओं का लाभ केवल 43 गांवों तक ही क्यों सीमित है? शेष गांवों के साथ यह भेदभाव क्यों? चार वर्षों से विकास कार्य ठप क्यों हैं? कई आंशिक प्रभावित गांवों को आज तक विकास पुस्तिका तक नहीं मिली।
*3. डैम का पानी किसानों की आजीविका क्यों छीन रहा है?*
कुकड़ू प्रखंड की सभी नौ पंचायतें प्रभावित हैं। अनावश्यक जल भंडारण के कारण दयापुर, कुमारी, झापागोड़ा, उदाटांड़, बांदाबीर, केंदुआंदा, चौका, आदारडीह, चानो समेत कई गांवों के पके धान के खेतों में पानी घुस गया है। एक तरफ विस्थापन का दर्द और दूसरी तरफ तैयार फसल की बर्बादी। किसानों के नुकसान की जिम्मेदारी कौन लेगा?
*4. किसानों और विस्थापितों को राहत कब मिलेगी?*
मधुश्री महतो ने मांग की कि जब तक सभी लंबित अनुदान राशि का भुगतान नहीं हो जाता, तब तक डैम का जलस्तर 179 RL से नीचे रखा जाए, ताकि किसानों की फसल और ग्रामीणों की आजीविका को और नुकसान न हो।
*5. विकास पुस्तिका और भुगतान में पारदर्शिता क्यों नहीं?*
2026 तक 18 वर्ष की आयु पूर्ण करने वाले सभी पात्र विस्थापितों की विकास पुस्तिका बनाई जाए। धारा-4 की प्रक्रिया में एकरूपता हो तथा भुगतान का सत्यापन स्थानीय जनप्रतिनिधियों और विस्थापित संगठनों की उपस्थिति में कराया जाए।
*विस्थापित संगठनों की संयुक्त मांगें*
– सभी पात्र विस्थापितों की विकास पुस्तिका का निर्माण एवं लंबित भुगतान सुनिश्चित किया जाए।
– विकास योजनाओं में RL की बाध्यता समाप्त कर वास्तविक जरूरत के आधार पर योजनाएं स्वीकृत हों।
– परियोजना तथा परियोजना का पानी लेने वाली कंपनियों में स्थानीय विस्थापित युवाओं को सीधी नियुक्ति में प्राथमिकता मिले।
– मुखिया होटल से अनुमंडल कार्यालय तक व्यवस्थित मार्केट प्लेस विकसित कर दुकानें वास्तविक विस्थापितों को आवंटित की जाएं।
– रसुनिया, दुलमी एवं पातकुम में नौका विहार और पर्यटन सुविधाएं विकसित हों।
– पुनर्वास के लिए अधिग्रहित जमीन का विधिवत पट्टा विस्थापित परिवारों को दिया जाए।
*13 करोड़ की कथित गड़बड़ी: जांच टीम फाइलें रांची ले गई*
विस्थापित मुक्ति वाहिनी के अंबिका जादव ने आरोप लगाया कि RL-180 मीटर से ऊपर के 10 गांवों की पुनर्वास राशि दूसरे गांवों के अपात्र व्यक्तियों को दी गई है, जिसमें करीब 13 करोड़ से अधिक की कथित गड़बड़ी है। मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच समिति RL-180 से 183 मीटर तक के प्रभावित गांवों के भुगतान अभिलेख अपने साथ रांची ले गई है। विशेष रूप से नीमडीह प्रखंड के हेवेन गांव के भुगतान पर सवाल उठे हैं। सुनवाई के दौरान मृत व्यक्ति के नाम पर भुगतान की शिकायत भी सामने आई। अब सवाल है कि यदि मृत व्यक्ति के नाम पर भुगतान हुआ तो राशि किसने ली, किसके सत्यापन पर जारी हुई और जिम्मेदार अधिकारी कौन हैं?
*मास्टर कार्ड का रहस्य क्या है?*
विस्थापित संगठनों ने पुनर्वास कार्यालय संख्या-2 की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए पूछा है –
आखिर मास्टर कार्ड क्या है और इसे सार्वजनिक जांच के दायरे में क्यों नहीं लाया जा रहा? इसमें इतनी गोपनीयता क्यों? क्या रिकॉर्ड में छेड़छाड़ हुई है? यदि नहीं तो निष्पक्ष जांच में परेशानी क्या है? क्या मास्टर कार्ड में गड़बड़ी कर अपात्र लोगों की विकास पुस्तिका बनाकर भुगतान कराया गया? हेवेन गांव का पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा? मास्टर कार्ड और भुगतान अभिलेखों का मिलान कर पात्र-अपात्र की स्थिति स्पष्ट की जाए।
*एक ही बैंक में खाते क्यों?*
जब विस्थापित अलग-अलग गांवों और दूर-दराज के क्षेत्रों में रहते हैं तो बड़ी संख्या में लोगों के खाते एक ही बैंक में क्यों खुलवाए गए? क्या लाभुकों को अपनी पसंद के बैंक में खाता खोलने की स्वतंत्रता नहीं थी? एक ही बैंक को प्राथमिकता का आधार क्या था? क्या बैंक कर्मचारियों और पुनर्वास कार्यालय के बीच मिलीभगत थी? भुगतान राशि वास्तविक लाभुकों के खातों में ही गई या अन्य माध्यम से निकाली गई? इसका स्वतंत्र ऑडिट होना चाहिए।
*पुनर्वास कार्यालय में दलालों का प्रभाव किसके संरक्षण में?*
विस्थापितों ने आरोप लगाया कि जमीन अधिग्रहण और मुआवजे में बिचौलियों की भूमिका संदिग्ध रही है। कुछ लोगों की विकास पुस्तिकाओं से राशि निकाले जाने में भी दलालों की भूमिका की जांच जरूरी है।
सवाल उठ रहे हैं – सरकारी कार्यालय में दलालों का इतना प्रभाव कैसे? विस्थापितों को अपने काम के लिए बिचौलियों के पास क्यों जाना पड़ता है? दलाल नियमित रूप से कार्यालय के बाहर किस काम से बैठे रहते हैं? कभी जनप्रतिनिधियों के साथ तो कभी पदाधिकारियों के साथ सचिवालय तक कैसे पहुंचते हैं? यदि कार्यालय पारदर्शी है तो दलालों की भूमिका की स्वतंत्र जांच में क्या परेशानी है?
विस्थापित संगठनों ने मांग की कि RL-180 से 183 मीटर तक के सभी प्रभावित गांवों के मास्टर कार्ड, विकास पुस्तिका, लाभुक सूची, भुगतान आदेश, बैंक खाता विवरण और निकासी अभिलेखों का मिलान कर निष्पक्ष जांच हो। जिन मामलों में मृत व्यक्ति, अपात्र लाभुक या गलत भुगतान की शिकायत है, उनकी अलग से जांच हो और दोषी पाए जाने पर कार्रवाई हो।
यह केवल 13 करोड़ की कथित अनियमितता का मामला नहीं है, बल्कि हजारों विस्थापित परिवारों के अधिकार, सम्मान और भविष्य का सवाल है।
पांच सदस्यीय जांच समिति में अध्यक्ष आर. रॉनिटा, अपर सचिव; अजय सिंह बड़ाईक, संयुक्त सचिव; कुमार अरविन्द, अधीक्षण अभियंता; ओंकार नाथ, अधीक्षण अभियंता तथा प्रभाष कुमार दत्ता, उप सचिव शामिल हैं। मौके पर अपर निदेशक गौतम कुमार भगत एवं आरओ सुखदेव महतो भी उपस्थित थे।

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