
सरायकेला-खरसावां जिले की चांडिल सुवर्णरेखा बहुउद्देशीय परियोजना को बने 44 साल से ज्यादा हो गए। हर चुनाव में ये मुद्दा बनता है, लेकिन विस्थापितों की पीड़ा आज भी वही है। एक तरफ सरकार डैम से हर साल करोड़ों का रेवेन्यू कमा रही है, दूसरी तरफ 116 गांव के विस्थापित अब तक मुआवजे और पुनर्वास का इंतजार कर रहे हैं।
चांडिल डैम से सरकार को अब तक कुल *717 करोड़ 67 लाख रुपये* का रेवेन्यू मिला है। अकेले 2025-26 में 127 करोड़ और अप्रैल 2026 में ही 65 करोड़ 28 लाख रुपये जमा हुए हैं। इसमें *583 करोड़ 54 लाख रुपये* टाटा कंपनी ने बकाए के तौर पर दिए हैं। जल संसाधन विभाग अन्य कंपनियों से भी शुल्क वसूलता है।

लेकिन इस डैम से प्रभावित *116 गांव और 84 मौजा* आज भी आरएल में बंद हैं। जिला प्रशासन की आबदा बैठक में सिर्फ पानी का स्तर 180.22 मीटर से नीचे रखने की बात होती है।

विस्थापितों का आरोप है कि उन्हें विस्थापन नीति के तहत पूरा मुआवजा नहीं मिला। आंशिक जमीनें भी डूब गईं। 8 मेगावाट बिजली और कृषि को पानी देने का वादा भी पूरा नहीं हुआ। सवाल ये है कि करोड़ों के रेवेन्यू से विस्थापितों की समस्या क्यों नहीं सुलझी?विस्थापितों का कहना है कि सरकार आरएल के नाम पर विस्थापन को टाल रही है। 44 साल बाद भी चांडिल डैम के विस्थापित न्याय की बाट जोह रहे हैं। सरकार रेवेन्यू तो ले रही है, लेकिन सवाल वही है – विस्थापितों की सुध कब लेगी?
सरायकेला खरसावां जिला के चांडिल सुवर्णरेखा
बहुउद्देशीय परियोजना बने 44 साल से ज्यादा हो गए, लेकिन हर चुनाव में सिर्फ मुद्दा बनकर रह जाता है। विस्थापितों की पीड़ा आज भी जस की तस है। सरकार डैम के पानी से हर साल करोड़ों का रेवेन्यू कमा रही है, लेकिन विस्थापितों को न मुआवजा मिला, न कोई ठोस समाधान।
चांडिल डैम से सरकार को पानी बेचकर लगभग 700 करोड़ रुपये का रेवेन्यू मिला है। जल संसाधन विभाग द्वारा टाटा सहित अन्य कंपनियों से भी इसका शुल्क वसूलता है।
लेकिन इस डैम से प्रभावित 116 गांव और 84 मौजा के लोग आज भी RL में बंद हैं। जिला स्तर पर होने वाली आबदा की बैठक में भी सिर्फ पानी का स्तर 180.22 मीटर से नीचे रखने की सलाह दी जाती है।
विस्थापितों का कहना है कि विस्थापन नीति के तहत उन्हें अब तक पूरा मुआवजा नहीं मिला है। आंशिक जमीनें भी डैम के जलाशय में डूब गई हैं। राज्य सरकार पानी बेचकर रेवेन्यू तो ले रही है, लेकिन उसी राशि से विस्थापितों की समस्याओं का समाधान नहीं किया जा रहा।
स्थानीय लोगों का सवाल है कि चांडिल जलाशय से मिलने वाले रेवेन्यू का पैसा आखिर कहां खर्च हो रहा है। आज तक न तो डैम की समुचित देखरेख और मेंटेनेंस के लिए कोई ठोस योजना बनी, न ही परियोजना के वादे पूरे हुए।
परियोजना के तहत 8 मेगावाट बिजली उत्पादन*और कृषि भूमि को पानी की आपूर्ति का लक्ष्य था, जो आज तक पूरा नहीं हो सका।
विस्थापितों का आरोप है कि स्थानीय विधायक और सांसद ने अब तक कैबिनेट की बैठक में इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं उठाया। अगर उठाया जाता तो 44 साल से चली आ रही उनकी पीड़ा काफी हद तक कम हो सकती थी।
अब सवाल यही है कि चुनाव के समय याद आने वाले विस्थापितों की सुध सरकार कब लेगी?
राकेश रंजन महतो, अध्यक्ष – विस्थापित अधिकार मंच फाउंडेशन ने कहा “आज जो निरीक्षण हुआ है वो अनऑफिशियल और अधिकार क्षेत्र के बाहर है। नौका विहार दिखाकर पदाधिकारी सिर्फ चापलूसी कर रहे हैं। इनके पास विस्थापितों के लिए कुछ नहीं है।
सरकार आरएल 171 से 180, 180 से 183 और 183 से 192 की बात कर रही है। लेकिन 2012 की पुनर्वास नीति में आरएल का कहीं जिक्र नहीं था। आज 178-79 तक पानी है, 9 गांव डूब चुके हैं, 34 गांव प्रभावित हैं। क्या उन्हें मुआवजा, नौकरी, विकास पुस्तिका या पुनर्वास की सुविधा मिली? कुछ नहीं।
बिना लाभ दिए, बिना पुनर्वास किए जबरदस्ती खेत डुबाए जा रहे हैं। ये अन्याय है। 24 तारीख को बैठक रखी गई है जिसमें सिर्फ 7 विस्थापितों को बुलाया जा रहा है। 116 गांव के लिए 7 लोग क्या तय करेंगे?
180 से 183 आरएल में 13 करोड़ रुपये बंदरबांट किए गए। असली विस्थापितों को पैसा नहीं मिल रहा, आश्रित मर रहे हैं। फंड करोड़ों में है लेकिन उसका उपयोग विस्थापितों के लिए नहीं हो रहा।
42 साल से रखा पत्थर अब दोबारा सीधा किया जा रहा है। बारिश-तूफान में ये काम कितना टिकेगा? सब लूट हो रही है। डैम से फायदा सिर्फ कंपनी, पदाधिकारी और कर्मियों को हुआ है। विस्थापितों को क्या मिला?”
एडी, जल संसाधन विभाग ने कहा “चांडिल डैम का पानी का स्तर बढ़ाने के लिए आरएल तय किया गया है। अभी हम *आरएल 183* तक पानी ले रहे हैं। जब तक पानी का स्तर 183 तक नहीं पहुंचेगा तब तक बिजली उत्पादन के लिए पानी नहीं दिया जा सकता।
अगर बिजली के लिए पानी देना है तो वाटर लेवल बढ़ाना पड़ेगा, लेकिन इससे कई और गांव प्रभावित होंगे। इसलिए इसे चरणों में किया जा रहा है। पहला चरण *आरएल 183* तक है। दूसरा चरण *183 से 192* तक होगा।
पहले आरएल तय नहीं था, इसलिए मुआवजा देने में दिक्कत थी। अब सरकार ने आरएल निर्धारित कर दिया है:
*171 से 180, 180 से 183, 183 से 185 और 185 से 192*। इसी के अनुसार हम काम कर रहे हैं। 180 के बाद जलस्तर बढ़ाने की बात चल रही है। मुआवजा सभी को देने के बाद ही वाटर लेवल बढ़ाया जाएगा।
स्वरोजगार के लिए भी प्रावधान है। मत्स्य पालन सहित अन्य कामों के लिए इच्छुक विस्थापितों को ट्रेनिंग दी जाएगी। इसके लिए राशि निर्धारित है और *2 लाख रुपये तक का मुआवजा* देने का प्रावधान है। जो विस्थापित स्वरोजगार करना चाहते हैं वे ट्रेनिंग लेकर अपना काम शुरू कर सकते हैं।
पूर्ण डूबी गांव को ही हम पूर्ण डूबी मानते हैं, आंशिक डूबे गांव को नहीं।
और 1991 के बाद सरकारी भर्ती बंद कर दी गई है। अब विस्थापितों को सिर्फ मुआवजा दिया जाएगा, नौकरी देने का प्रावधान नहीं है।”
संजय सिंह, कार्यपालक अभियंता, सुवर्णरेखा परियोजना अंचल एवं प्रमंडल कार्यालय, “चांडिल”
ने कहा “चांडिल डैम से पानी के निष्पादन से सरकार को राजस्व में लगातार बढ़ोतरी हुई है।
2020-21 में 26 करोड़ 70 लाख, 2021-22 में 29 करोड़ 76 लाख, 2022-23 में 31 करोड़ 87 लाख और 2023-24 में 120 करोड़ 3 लाख रुपये प्राप्त हुए।
2024-25 में यह राशि 127 करोड़ 20 लाख तक पहुंच गई। वहीं 2025-26 में अब तक कुल 717 करोड़ 67 लाख रुपये प्राप्त हो चुके हैं, जिसमें 583 करोड़ 54 लाख रुपये टाटा कंपनी द्वारा बकाए के रूप में जमा किए गए हैं।
अब सभी कंपनियां एडवांस में बिल जमा कर रही हैं। इसी कारण इस वित्तीय वर्ष 2026-27 के अप्रैल महीने में ही 65 करोड़ 28 लाख रुपये प्राप्त हुए हैं। मेरा कार्यकाल अगस्त 2023 से है और यह मेरा अतिरिक्त प्रभार है।
डैम के मेंटेनेंस कार्य भी तेज़ी से हुए हैं। रियल गेट और दो अंडर स्लुइस गेट को चालू कर दिया गया है, जिससे पहले जमा होने वाली गाद अब निकल रही है। इसके अलावा दो अतिरिक्त स्लुइस गेट और नहर के दोनों गेट भी पूरी तरह ऑपरेटिव हैं। इस तरह डैम के सभी 13 रेडियल गेट और 4 स्लुइस गेट काम कर रहे हैं।
डैम का संचालन अब SCADA सिस्टम, मैकेनिकल और मैनुअल तीनों माध्यमों से होता है। हर पल पानी का डिस्चार्ज और लेवल की जानकारी उपलब्ध रहती है। कुल मिलाकर डैम का संचालन और रख-रखाव अब बेहतर स्थिति में है।”
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