
परियोजना से बने चांडिल डैम को प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित किया गया है। डैम जाने के लिए अनुमति लेनी पड़ती है। लेकिन सवाल यह है कि सुवर्णरेखा परियोजना अंचल एवं प्रमंडल कार्यालय चांडिल से महज दो मीटर की दूरी पर डैम के मुख्य गेट पर लगे सीसीटीवी कैमरे वर्षों से बंद पड़े हैं।
वर्तमान में डैम की देखरेख और मरम्मती पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। डैम के रेडियल गेट परिसर के आसपास विभिन्न प्रकार की मरम्मती का कार्य चल रहा है। डैम गेट की गार्डवाल में पत्थर की पिचिंग आदि का काम ठेकेदार द्वारा किया जा रहा है।

लेकिन सीसीटीवी कैमरों की मरम्मती और देखरेख को लेकर किसी भी अधिकारी ने अब तक संज्ञान नहीं लिया है।

डैम की सुरक्षा के लिए जो सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं, अगर वही बंद पड़े हैं तो गार्ड तैनात करने से क्या फायदा? यह लापरवाही सीधे-सीधे डैम की सुरक्षा से खिलवाड़ है।
राकेश रंजन महतो ने कहा कि चांडिल डैम को बने 40 वर्षों से अधिक हो गए हैं। केंद्र और राज्य सरकार द्वारा आज तक एक भी योजना धरातल पर नहीं उतारी गई है। विस्थापन नीति के तहत ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र के 116 गांव और 84 मौजा के ग्रामीण विस्थापित आज भी दर-दर भटक रहे हैं। परिवार के भरण-पोषण के लिए लोग दूसरे राज्य में पलायन करने को मजबूर हैं।
उन्होंने सवाल किया कि आखिर कब तक विस्थापन नीति आयोग और सरकार विस्थापितों के हित के बारे में सोचेगी।
एक तरफ जलाशय का जलस्तर बढ़ने से बाढ़ का खतरा बना हुआ है, तो दूसरी ओर हाथियों के आतंक से जनजीवन अस्त-व्यस्त है। आए दिन हाथी और मानव संघर्ष की घटनाएं सामने आ रही हैं।
राकेश रंजन महतो ने प्रशासन और सुवर्णरेखा परियोजना के अधिकारियों से मांग की है कि डैम के मुख्य गेट पर लगे सीसीटीवी कैमरों को तत्काल दुरुस्त किया जाए और डैम की सुरक्षा व्यवस्था को पुख्ता किया जाए।
विस्थापितों का कहना है कि जब तक सुरक्षा और विस्थापन दोनों मुद्दों पर ठोस कदम नहीं उठाए जाएंगे, तब तक ईचागढ़ क्षेत्र के नागरिक हर साल बाढ़ और विस्थापन की मार झेलते रहेंगे।
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