
कथा के शुभारंभ से पूर्व पूज्य महाराज श्री ने समस्त भक्तों से भावपूर्ण अनुरोध किया था कि जो भी भक्त कथा श्रवण के लिए पधारें, वे माथे पर तिलक लगाकर ही आएं। उनके इस आग्रह का भक्तों ने पूरे भाव और अनुशासन के साथ पालन किया। कथा स्थल पर उपस्थित सभी श्रद्धालु तिलक धारण किए हुए नजर आए, जिससे संपूर्ण पंडाल एक दिव्य और सनातनी स्वरूप में परिवर्तित हो गया।
बच्चों को संस्कारवान बनाना है तो उन्हें सत्संग और श्रीमद्भागवत कथा से जोड़ें

हम अपनी आने वाली पीढ़ी को संस्कारवान, चरित्रवान और धर्मनिष्ठ बनाना चाहते हैं, तो उन्हें बचपन से ही सत्संग और श्रीमद्भागवत कथा से जोड़ना होगा। माता-पिता का यह दायित्व बनता है कि वे अपने बच्चों को कथा, भजन, सत्संग और धार्मिक आयोजनों में अवश्य लेकर जाएँ। कथा के माध्यम से बच्चों को भगवान श्रीकृष्ण, भगवान श्रीराम और महान संतों के आदर्श जीवन से प्रेरणा मिलती है। वे सत्य, करुणा, सेवा, विनम्रता, माता-पिता का सम्मान, गुरु के प्रति श्रद्धा, राष्ट्रप्रेम और मानवता जैसे जीवन मूल्यों को सहज रूप से सीखते हैं।

सनातनी की पहचान—माथे पर तिलक,हाथ में कलावा,सिर पर शिखा, गले में तुलसी की माला और मुख में भगवान का नाम
हर सनातनी के माथे पर तिलक, सिर पर शिखा, गले में तुलसी की माला और मुख में हर समय भगवान का नाम होना चाहिए – ये केवल पहचान नहीं, बल्कि आत्मिक अनुशासन के प्रतीक हैं। शिखा ज्ञान, संयम और वैदिक परंपरा के प्रति श्रद्धा का प्रतीक मानी जाती है। तुलसी की माला भगवान के प्रति भक्ति, पवित्रता और सात्विक जीवन का संदेश देती है। वहीं मुख में भगवान का नाम होने का अर्थ है कि व्यक्ति हर परिस्थिति में ईश्वर का स्मरण करे और अपने विचारों तथा कर्मों को धर्म के अनुरूप रखे।
अच्छे संस्कार ही बच्चों को अपराध और गलत मार्ग से बचाते हैं
आज समाज में अनेक बच्चे और युवा छोटी-छोटी बातों पर हिंसा, झगड़े और अपराध जैसे गलत कदम उठा लेते हैं। इसका एक प्रमुख कारण नैतिक मूल्यों और अच्छे संस्कारों की कमी है। हर माता-पिता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी केवल बच्चों को अच्छी शिक्षा और सुविधाएँ देना ही नहीं, बल्कि उन्हें एक अच्छा इंसान बनाना भी है। उन्हें बचपन से सत्य, ईमानदारी, करुणा, सेवा, धैर्य, अनुशासन और बड़ों के सम्मान जैसे जीवन मूल्यों की शिक्षा देनी चाहिए। यदि बच्चों को घर से अच्छे संस्कार मिलते हैं, तो वे न केवल अपने परिवार का नाम रोशन करते हैं, बल्कि समाज और राष्ट्र के लिए भी एक जिम्मेदार एवं आदर्श नागरिक बनते हैं।
मनुष्य जीवन ही ईश्वर भक्ति और मोक्ष प्राप्ति का सर्वोत्तम अवसर है
भगवान को संसार में मनुष्य सबसे प्रिय है, क्योंकि केवल मनुष्य ही अपनी पूजा, साधना, भक्ति और सदाचार के माध्यम से परमात्मा की प्राप्ति कर सकता है। अन्य योनियों में जीव केवल अपने कर्मों के फल भोगते हैं, लेकिन मनुष्य जीवन को भगवान ने आत्मोन्नति और मोक्ष प्राप्ति का अवसर दिया है। यदि मनुष्य श्रद्धा, प्रेम और समर्पण भाव से ईश्वर का स्मरण करता है, तो वह जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होकर परम शांति और ईश्वर की कृपा को प्राप्त कर सकता है। मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ और अनमोल है, जिसे केवल ईश्वर भक्ति में लगाकर ही सफल बनाया जा सकता है।
अहंकार नहीं, विनम्रता और कृतज्ञता ही जीवन की सच्ची महानता है
अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु माना गया है। मनुष्य को सदैव यह स्मरण रखना चाहिए कि जो कुछ भी उसके पास है, वह ईश्वर की कृपा, माता-पिता के आशीर्वाद, गुरु के मार्गदर्शन और समाज के सहयोग का परिणाम है। इसलिए सफलता मिलने पर अभिमान नहीं, बल्कि कृतज्ञता का भाव होना चाहिए। जीवन में सच्ची महानता ऊँचा पद या अधिक धन पाने से नहीं, बल्कि अच्छे चरित्र, विनम्र व्यवहार और दूसरों के प्रति सम्मान की भावना से प्राप्त होती है। मंतोष साधू बाबा,तपन कुमार गोप सधर्मपत्नी श्रीमती पारूल देवी विनोद महतो सधर्मपत्नी उतरा देवी,सुभाष गिरी,कमलेश गोप,नितेश गोप,गौतम गोप,शिवपुजन गोप,डीएन सिंह,धीरेन महतो, राजकिशोर गोप,महेंद्र प्रसाद, संतोष गोप,मनोज गोप , अरुण गिरी,लक्षु गोप,सुभाष गिरी,पार्थो सारथी , हरिभजन गोप, सत्यनारायण महतो,छठीलाल महतो, परमेश्वर महतो,भरत कुंभकार, विश्वनाथ कुंभकार,लखन गिरी, परमेश्वर गोप, रंजीत गोप,सुनिल गोप, विद्यासागर जी आदि सभी साबलपुर गोसाईडीह के सहयोग से किया जा रहा है।
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