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सरायकेला : नीमडीह के लेवाटांड में सड़क नहीं, खटिया पर मरीज ।

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Sep 16, 2026
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सरायकेला-खरसावां जिले के नीमडीह प्रखंड के लाकड़ी गांव के टोला लेवाटांड में आजादी के इतने साल बाद भी ग्रामीण पक्की सड़क के लिए तरस रहे हैं। लेवाटांड से बांदू मुख्य सड़क तक डेढ़ किलोमीटर का कच्चा रास्ता बारिश में कीचड़ और बड़े-बड़े गड्ढों में बदल जाता है। हालात ऐसे हैं कि पैदल चलना भी मुश्किल है।

कीचड़ में जिंदगी, खटिया पर मरीज

ग्रामीणों का कहना है कि बदहाल सड़क का सबसे ज्यादा खामियाजा मरीजों, गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों को भुगतना पड़ता है। तबीयत बिगड़ने या प्रसव पीड़ा में एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच पाती। मजबूरी में मरीज को खटिया की डोली बनाकर डेढ़ किलोमीटर कीचड़ भरे रास्ते से मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ता है, तब जाकर नीमडीह या जमशेदपुर अस्पताल ले जाया जाता है। ग्रामीण बोले – “मरीज को अस्पताल पहुंचाएं या रास्ते में जान बचाएं? हर मिनट भारी पड़ता है।”

बच्चों की पढ़ाई पर असर

बच्चों को रोज इसी कीचड़ से होकर स्कूल-कॉलेज जाना पड़ता है। कई जगह फिसलन इतनी है कि गिरने का डर बना रहता है।

 

झिमरी जाने का खतरा

लेवाटांड से झिमरी जाने के लिए 2 किलोमीटर का रास्ता तय करना पड़ता है, बीच में शांखा नदी है। नदी पर पुल नहीं है, तो ग्रामीणों को जान जोखिम में डालकर रेलवे ब्रिज और कई बार रेलवे ट्रैक पर चलना पड़ता है। कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है।

जनप्रतिनिधियों पर आक्रोश – सड़क नहीं तो वोट नहीं

ग्रामीणों में जनप्रतिनिधियों को लेकर भारी गुस्सा है। आरोप है कि आज तक किसी विधायक-सांसद ने गांव आकर स्थिति नहीं देखी। चुनाव में बड़े-बड़े वादे होते हैं, बाद में गांव भुला दिया जाता है। गुस्साए ग्रामीणों ने कहा – “सड़क नहीं तो वोट नहीं” और विधायक-सांसद को गांव में नहीं घुसने देने तक की चेतावनी दी है। हालांकि यह फिलहाल आक्रोश है, अंतिम फैसला सामूहिक होगा।

ग्रामीणों की एक ही मांग है – पहले लेवाटांड तक पक्की सड़क और शांखा नदी पर पुल, फिर विकास की बात। अब देखना है प्रशासन इस पर कब पहल करता है।


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