
समीक्षा – संजय चौहान
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम सुनते ही, हमारे मन में एक सशक्त, दृढ़-निश्चयी और कठोर राजनेता की छवि उभरती है। लेकिन, हाल ही में एक वर्चुअल संबोधन में, उनकी एक अलग ही तस्वीर सामने आई, जिसने हर किसी को भावुक कर दिया। जब उन्होंने ‘मां की गाली’ जैसे संवेदनशील विषय पर अपने दिल का दर्द बयां किया, तो उनकी आवाज में पीड़ा और गहरी संवेदना थी।

प्रधानमंत्री ने कहा कि कुछ लोग उन्हें खुलेआम ‘मां की गाली’ देते हैं। यह बात सुनते ही, हॉल में सन्नाटा छा गया। उनकी आवाज में वो दर्द था, जो एक बेटा अपनी मां के लिए महसूस करता है। उन्होंने सवाल किया कि क्या कोई व्यक्ति राजनीतिक विरोध के नाम पर इस हद तक गिर सकता है कि किसी की मां को गाली दे? उनकी बात सिर्फ एक राजनेता के तौर पर नहीं, बल्कि एक बेटे के तौर पर थी, जो अपनी मां के सम्मान के लिए चिंतित था।

उन्होंने कहा कि मेरी मां तो अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन यह सोचकर ही दिल कांप उठता है कि क्या किसी की मां को इस तरह सार्वजनिक रूप से अपमानित करना उचित है? उनकी ये बातें उन लोगों के लिए एक करारा जवाब थीं, जो राजनीति में भाषा की मर्यादा को भूल चुके हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भले ही वह सत्ता में हैं, लेकिन उनकी मां का नाम लेकर उन्हें गाली देना, एक व्यक्ति के तौर पर उन्हें बहुत आहत करता है।
प्रधानमंत्री ने अपनी बात में एक गहरी सीख भी दी। उन्होंने कहा कि राजनीति अपनी जगह है, लेकिन व्यक्तिगत जीवन और परिवार का सम्मान करना हमारी संस्कृति का हिस्सा है। उन्होंने उन सभी लोगों से अपील की, जो इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करते हैं, कि वे अपनी मां, बहन और बेटियों के बारे में सोचें।
यह संबोधन सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं था, बल्कि एक बेटे की मार्मिक पुकार थी। इसने यह भी दिखाया कि सत्ता की ऊंचाइयों पर बैठे व्यक्ति के पास भी भावनाएं होती हैं, और वे भी अपमान से आहत होते हैं। इस घटना ने एक बार फिर समाज में घटते नैतिक मूल्यों और राजनीतिक कटुता पर बहस छेड़ दी है।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी बात से यह संदेश दिया कि राजनीतिक विरोध को व्यक्तिगत दुश्मनी में नहीं बदलना चाहिए। उन्होंने अपनी मां के सम्मान की बात कर, उन सभी लोगों का दर्द बयां किया, जिनकी मां को बेवजह गाली दी जाती है। यह एक ऐसा क्षण था, जिसने लाखों लोगों के दिलों को छुआ और उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या हमारी राजनीति इस हद तक गिर चुकी है कि हम किसी की मां को भी बख्श नहीं रहे।
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