
मिथिला में दुर्गा पूजा में बेलन्योती की परम्परा अनोखी है। बेलन्योती 9 अक्टूबर को है। इसकी तैयारी पूजा समिति ने शुरू कर दी है। संस्कृत साहित्य के विद्वान डॉ रामसेवक झा तथा आचार्य रमण जी झा ने बताया कि बेलन्योती में पूजा स्थलों से शुभ मुहूर्त में घड़ी घंट व शंख की सुमधुर आवाज के बीच भक्त डोली लेकर आचार्य के साथ बेल वृक्ष के पास जाते हैं।
डोली का परिभ्रमण जब गांवों में होता है तो माहौल भक्तिरस में सराबोर हो जाता है। श्रद्धालु भक्त डोली पर चढ़ावा चढ़ाते हैं। परिभ्रमण के बाद बेल वृक्ष में जुड़वां बेल (जोट्टा बेल) की पूजा शास्त्रीय पद्धति से की जाती है।

इस जोट्टा बेल को मंत्र से अभिमंत्रित कर लाल कपड़े से बांध दिया जाता है। इसे ही बेलन्योती कहा जाता है। सप्तमी तिथि को सूर्योदय के पूर्व भक्तजन गाजे-बाजे के साथ बेल वृक्ष के पास पहुंचते हैं। फिर उस बेल को तोड़कर पूजा स्थल पर लाया जाता है।

जोट्टा बेल का विधि-विधान के साथ पूजनोपरांत उसके लस्से से जगदंबा को प्राण प्रतिष्ठा दी जाती है। इसके बाद विधिवत दर्शनार्थ नेत्रपट खोल दिया जाता है।
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