
सरायकेला : पश्चिम बंगाल और झारखंड में भगवान शिव के मानस पुत्री के रूप में पूजी जाने वाली मां मनसा देवी की आराधना सोमवार से शुरू हो गई। सावन संक्रांति से भादो संक्रांति तक एक माह चलने वाले इस पर्व को बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार चांद सौदागर उर्फ चांद वानिया को मां मनसा का प्रथम उपासक माना जाता है। कहा जाता है कि बीरभूम जिले के चपक नगर निवासी चांद सौदागर ने सर्वप्रथम मां मनसा की पूजा की थी। आज यह पूजा पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओडिशा और बिहार के लाखों घरों में की जाती है।

*दो दिन पहले दिया गया था निमंत्रण*

पूजा से दो दिन पहले भक्तों ने अपने नजदीकी तालाब में मां मनसा को पान-सुपारी देकर पूजा में आने का निमंत्रण दिया था।
*कलश यात्रा के साथ शुरू हुई पूजा*
सोमवार शाम भक्त तालाब पहुंचे और विधिवत पूजा-अर्चना के बाद कलश/घट में जल भरकर उसे माथे पर उठाया। ढाक-ढोल, शंख और घंटा की गूंज के बीच मां मनसा के मंत्रोच्चार के साथ भव्य कलश यात्रा निकाली गई। इसके बाद भक्त अपने घर स्थित मनसा मंदिर पहुंचे और रातभर फूल, फल, मिष्ठान आदि से मां की पूजा की।
*बतख की बलि और विशेष महत्व*
मंगलवार सुबह भक्तों ने मन्नत के अनुसार मां को चढ़ावा अर्पित किया। कई स्थानों पर बखरा और बतख की बलि भी दी गई। एक माह चलने वाली पूजा के लिए बाजार में बतख की मांग काफी बढ़ गई है। बतख की कीमत *₹300 से ₹500-600* तक पहुंच गई है।
व्यापारियों के अनुसार बतख पश्चिम बंगाल, बनारस और दक्षिण भारत के व्यापारियों से मंगाए जा रहे हैं। झारखंड में इसकी खपत सबसे अधिक बताई जा रही है।
*गांव से शहर तक गूंजे जयकारे*
आज गांव से लेकर शहरी क्षेत्र तक मां मनसा मंदिरों में भक्तों की भीड़ रही। महिलाओं ने विशेष रूप से व्रत रखकर पूजा-अर्चना की और परिवार की सुख-समृद्धि व सर्पदंश से रक्षा की कामना की।
मां मनसा नागो के देवी की यह एक माह की पूजा सर्प देवता की आराधना और लोक आस्था का प्रतीक मानी जाती है।
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