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सरायकेला: ईचागढ़ में ‘स्वर्ण नदी’ से सोना नहीं, बालू लूट रहा माफिया; कीमतें आसमान पर, सरकार को राजस्व नहीं

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May 22, 2026
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सरायकेला : ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र को लेकर एक पुरानी कहावत है कि यहां का राजा आभूषण की जगह सोने के जूते पहनता था। इसी कारण यहां बहने वाली नदी को ‘स्वर्णरेखा’ कहा गया। लेकिन आज के दौर में हालात बदल गए हैं। अब सोने से ज्यादा बालू की कीमत हो गई है। ‘स्वर्ण नदी’ की कोख से सोना नहीं, बालू माफिया की चांदी कट रही है।

 

*सरकार को राजस्व नहीं, जनता से वसूली*

सरकार को बालू से मिलने वाला रेवेन्यू नहीं मिल रहा, लेकिन आम जनता को एक ट्रैक्टर बालू 4,500 से 5,000 रुपये में खरीदना पड़ रहा है। वहीं एक हाईवा बालू की कीमत 45,000 से 50,000 रुपये तक पहुंच गई है। अबुआ आवास, पीएम आवास जैसे सरकारी योजनाओं के लाभुकों को भी घर बनाने के लिए बालू पर मोटी रकम खर्च करनी पड़ रही है। महंगे बालू के कारण गरीबों का आशियाने का सपना टूट रहा है।

 

*दिन-रात चल रहा अवैध खनन, स्वर्ण नदी का अस्तित्व खतरे में*

स्वर्णरेखा नदी का अस्तित्व आज खतरे में है। नदी में दिन-रात अवैध बालू खनन का खेल चल रहा है। विपक्ष भी इस मुद्दे पर मौन बैठा है। रात्रि में स्वर्णरेखा के खेरी घाट, जारोगडीह, बामनडीह, तिरुलडीह, सपादा घाटों से रोजाना 150 से 200 हाईवा बालू का अवैध उठाव हो रहा है। जेसीबी मशीनों से दिन-दहाड़े नदी का सीना छलनी किया जा रहा है।

 

*थाना की ‘पगड़ी’ से चल रहा गोरखधंधा*

सूत्रों के अनुसार इस पूरे अवैध कारोबार में ईचागढ़ एवं तिरुलडीह थाना की अहम भूमिका है। आरोप है कि दोनों थाना प्रभारियों को प्रति हाईवा 5,000 रुपये ‘पगड़ी’ के तौर पर दिए जाते हैं। इसके अलावा घाट से बालू लोडिंग के लिए अलग से 1,000 रुपये प्रति हाईवा वसूला जाता है। ‘एंट्री’ मिलने के बाद गाड़ियां बेरोकटोक बंगाल और जमशेदपुर तक जाती हैं।

 

*माइनिंग विभाग की लापरवाही, हाथी प्रभावित क्षेत्र में संकट*

खनन विभाग की लापरवाही भी खुलकर सामने आ रही है। यह पूरा इलाका हाथी बहुल क्षेत्र है। अवैध खनन से बने गहरे गड्ढों में गिरकर हाथियों की मौत का खतरा बढ़ गया है। साथ ही भू-जल स्तर नीचे जा रहा है और नदी का स्वरूप बिगड़ रहा है। एनजीटी के नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ रही हैं।

 

स्थानीय ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि स्वर्णरेखा नदी को बचाने के लिए अवैध खनन पर तुरंत रोक लगाई जाए और दोषी पदाधिकारियों पर कार्रवाई हो। ग्रामीणों का कहना है कि अगर यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब ‘स्वर्ण नदी’ इतिहास के पन्नों में ही सिमट कर रह जाएगी।


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