
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत द्वारा सरना धर्म को महज एक ‘पूजा पद्धति’ बताए जाने पर झारखंड की राजनीति और आदिवासी समुदायों में उबाल है। झारखंड कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष और पूर्व विधायक बंधु तिर्की ने इस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि भागवत का यह दावा न केवल भ्रामक है, बल्कि आदिवासियों की विशिष्ट पहचान पर हमला है।

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक भिन्नता

बंधु तिर्की ने स्पष्ट किया कि धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से सरना धर्मावलंबी और हिंदू एक नहीं हैं। उन्होंने तर्क दिया कि आदिवासियों की अपनी एक अलग पहचान है जो प्रकृति पूजा पर आधारित है। आरएसएस लंबे समय से ‘सरना-सनातन एक है’ का नैरेटिव गढ़ने की कोशिश कर रहा है, जिसे झारखंड के तमाम आदिवासी संगठनों ने सिरे से नकार दिया है। तिर्की के अनुसार, भागवत का यह सोचना कि उनके द्वारा कही गई बातें ‘ब्रह्मवाक्य’ मान ली जाएंगी, उनका सबसे बड़ा भ्रम है।
पूजा पद्धति नहीं, धार्मिक पहचान
विवाद का मुख्य केंद्र सरना धर्म की परिभाषा है। तिर्की ने सवाल उठाया कि मोहन भागवत यह तय करने वाले कौन होते हैं कि आदिवासियों की धार्मिक पहचान क्या है? उन्होंने जोर देकर कहा:
सरना धर्मकोड: यह आदिवासियों के अस्तित्व और उनकी अलग धार्मिक पहचान से जुड़ा मामला है।
पूजा पद्धति बनाम धर्म: इसे केवल एक कर्मकांड या ‘पूजा पद्धति’ बताना आदिवासियों के गौरवशाली इतिहास को कमतर आंकना है।
राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव
झारखंड में आदिवासी संगठनों के बीच इस बयान को लेकर काफी आक्रोश है। दिलचस्प बात यह है कि जहाँ कांग्रेस और क्षेत्रीय संगठन मुखर होकर इसका विरोध कर रहे हैं, वहीं भाजपा के कई आदिवासी नेता इस मुद्दे पर स्पष्ट रुख अपनाने से बच रहे हैं।
यह विवाद एक बार फिर सरना धर्मकोड की मांग को केंद्र में ले आया है, जो झारखंड की राजनीति में एक अत्यंत संवेदनशील और निर्णायक मुद्दा बना हुआ है।
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