
सरायकेला : चांडिल अनुमंडल क्षेत्र के चांडिल मुख्य बाजार स्थित हरिजन कालिंदी बस्ती आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित होकर नारकीय जीवन जीने को मजबूर है। देश आजाद हुआ, बिहार से अलग होकर झारखंड बना, आदिवासी मुख्यमंत्री की सरकार बनी, फिर भी इस दलित बस्ती की तस्वीर नहीं बदली।
*1500 की आबादी, फिर भी विकास से दूर*

लगभग 80-90 घरों में बसे 150-160 परिवारों की कुल आबादी 1500-1800 के करीब है, लेकिन विकास और सरकारी योजनाओं का लाभ आज तक इस बस्ती तक नहीं पहुंच सका। बस्ती में न पक्की सड़क है, न नाली, न शौचालय। बरसात में पूरा इलाका कीचड़ और गंदगी से भर जाता है।

सबसे दुखद पहलू यह है कि बस्ती से मात्र 200-300 मीटर की दूरी पर कई समाजसेवियों व नेताओं के आवास, साथ ही चांडिल थाना और अस्पताल मौजूद हैं। पंचायत भवन लगभग 1-1.5 किलोमीटर तथा मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के मामा का घर भी करीब 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसके बावजूद प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की नजर इस दलित-हरिजन बस्ती की बदहाल स्थिति पर नहीं पड़ी।
बस्तीवासियों का कहना है कि विकास की बातें केवल भाषणों और कागजों तक सीमित हैं। यहां आज भी लोग खुले में शौच जाने को मजबूर हैं। पीने के पानी के लिए एकमात्र चापाकल पर निर्भरता है जो अक्सर खराब रहता है। बस्ती में जल-जमाव से मलेरिया-डायरिया जैसी बीमारियां आम हैं।
स्थानीय बुजुर्ग रामलाल कालिंदी बताते हैं, “प्रधानमंत्री आवास, शौचालय, नल-जल योजना का नाम सुना है, पर मिला कुछ नहीं। वोट के समय नेता आते हैं, वादा करते हैं, फिर भूल जाते हैं।” महिलाओं ने बताया कि आंगनबाड़ी और राशन कार्ड तक नहीं बने हैं। बच्चों के लिए स्कूल दूर है, बरसात में जाना मुश्किल हो जाता है।
बस्तीवासियों ने जिला प्रशासन और राज्य सरकार से तत्काल हस्तक्षेप कर सड़क, नाली, शौचालय, पेयजल और आवास की व्यवस्था करने की मांग की है। सवाल अब भी वही है- सत्ता और व्यवस्था के केंद्र के इतने करीब रहकर भी यह बस्ती उपेक्षित क्यों है?
चांडिल की हरिजन कालिंदी बस्ती: न घर, न नाली, न शौचालय… बारिश में बहता है नाले का गंदा पानी, अबुआ आवास, मंईयां सम्मान तक नहीं मिला”, जर्जर आंगनबाड़ी में बच्चे कुपोषण की कगार पर ।
चांडिल के हरिजन कालिंदी बस्ती में विकास सिर्फ नेताओं के भाषणों और सरकारी कागजों तक सीमित है। 1800 की आबादी वाली इस दलित बस्ती में आज भी लोग नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं।
*सिर पर छत नहीं, टपकते घरों में जान जोखिम में*
बस्तीवासियों का कहना है कि यहां आज भी लोगों को रहने के लिए सुरक्षित घर नसीब नहीं है। न अबुआ आवास योजना का लाभ मिला, न प्रधानमंत्री आवास योजना का। अधिकांश घर जर्जर अवस्था में हैं और बरसात के दिनों में पानी टपकता है। कच्ची दीवारें और टूटी खपरैल कभी भी ढह सकते हैं। हर मानसून यहां के लोगों के लिए दहशत लेकर आता है।
बस्ती में न स्वास्थ्य केंद्र है, न आंगनबाड़ी केंद्र। “मंईयां सम्मान योजना” जैसी योजनाओं का लाभ भी यहां की महिलाओं को नहीं मिल पाया है। राशन कार्ड, वृद्धा पेंशन, विधवा पेंशन के लिए भी लोग दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।
*बारिश में घरों में घुसता है नाले का मल-मूत्र*
बारिश के समय स्थिति और भयावह हो जाती है। बाजार की ओर से बहकर आने वाला नाले का गंदा पानी, कचरा, मल-मूत्र लोगों के घरों और रसोई तक में घुस जाता है। बस्ती में नाली और जल निकासी की कोई व्यवस्था नहीं है। पूरी बस्ती तालाब बन जाती है।
यहां तक कि अधिकांश परिवारों के पास शौचालय तक नहीं है, जिसके कारण आज भी लोग खुले में शौच करने को मजबूर हैं। स्नान एवं अन्य सामाजिक कार्यों के लिए बस्तीवासी तालाब और नदी पर निर्भर हैं, लेकिन वहां तक जाने के लिए भी कोई समुचित रास्ता नहीं है। कीचड़ भरे रास्तों से महिलाओं को गुजरना पड़ता है।
पूरी बस्ती में केवल एक जर्जर और टूटा-फूटा आंगनबाड़ी भवन है, जो स्वयं बदहाली की कहानी बयान करता है। छत टूटी है, दीवारों में दरारें हैं। नियमित आंगनबाड़ी केंद्र नहीं होने से लगभग 400-500 से कोई बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। पोषाहार और टीकाकरण से वंचित हैं।
*”हम भी इसी देश के नागरिक हैं”*
बस्ती की सुनीता देवी कहती हैं, “नेता लोग वोट मांगने आते हैं। फोटो खिंचाते हैं। पर जीतने के बाद कोई नहीं पूछता। क्या दलित-हरिजन होना ही हमारी सबसे बड़ी गलती है? हम भी इसी देश के नागरिक हैं।”
बस्तीवासियों ने उपायुक्त सरायकेला और मुख्यमंत्री से बस्ती का दौरा कर तत्काल आवास, नाली, शौचालय, पेयजल, स्वास्थ्य केंद्र और आंगनबाड़ी की व्यवस्था करने की मांग की है। थाना और अस्पताल से 300 मीटर दूर बसी इस बस्ती की उपेक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करती है।
चांडिल की हरिजन कालिंदी बस्ती, कोई बच्चे कुपोषित, गर्भवती महिलाएं टीकाकरण से वंचित।
*”चुनाव में वादा कर जाते हैं, जीत के बाद कोई सुध नहीं लेता”, एक साल पहले नाली-रास्ते का आश्वासन भी हवा*
चांडिल के हरिजन कालिंदी बस्ती में सरकारी उपेक्षा का सबसे दर्दनाक असर बच्चों और महिलाओं पर पड़ रहा है। आंगनबाड़ी केंद्र नहीं होने से लगभग 400-500 बच्चे को पोषाहार और प्रारंभिक शिक्षा से वंचित हैं।
*6 साल से कम बच्चों की शिक्षा पर संकट*
ज्ञात हो कि 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों को प्राथमिक विद्यालय में प्रवेश नहीं मिलता और उन्हें प्रारंभिक शिक्षा आंगनबाड़ी केंद्र से ही प्राप्त करनी होती है। वहीं गर्भवती महिलाओं को टीकाकरण, पोषण और स्वास्थ्य सुविधाएं भी आंगनबाड़ी के माध्यम से मिलती हैं। लेकिन इस बस्ती में आंगनबाड़ी की व्यवस्था नहीं होने के कारण बच्चे कुपोषण और अशिक्षा की ओर धकेले जा रहे हैं तथा गर्भवती महिलाएं स्वास्थ्य सुविधाओं से पूरी तरह वंचित हैं।
*”चुनाव में आते हैं, वादा कर चले जाते हैं”*
बस्तीवासियों का आरोप है कि जब चुनाव आते हैं, उसी दौरान नेता पहुंचते हैं। वादे करके चले जाते हैं, जीत के बाद कोई नेता-मंत्री सुध लेने नहीं पहुंचता।
*एक साल से सिर्फ आश्वासन*
बस्तीवासियों ने बताया कि कई बार विधायक, सांसद, जिला परिषद सदस्य, मुखिया और प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष गुहार लगाई, लेकिन अब तक कोई ठोस पहल नहीं हुई। जिला परिषद प्रतिनिधि श्री ओम लायक द्वारा एक वर्ष पूर्व नाली और रास्ता निर्माण का आश्वासन दिया गया था, पर आज तक कार्य शुरू तो दूर, निरीक्षण तक नहीं किया गया।
*कालिंदी समाज ने उठाई आवाज*
सरायकेला-खरसावां जिला कालिंदी समाज के जिला अध्यक्ष कृष्ण कालिंदी ने कहा, “यह दलित समाज के साथ भेदभाव है। थाना-अस्पताल से 300 मीटर दूर 1800 लोग नरक में जी रहे हैं। न घर, न शौचालय, न पानी। बच्चे कुपोषित हो रहे हैं। अगर 15 दिन में प्रशासन नहीं चेता तो हम डीसी कार्यालय के समक्ष धरना देंगे।”
उन्होंने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से सवाल किया कि जब आपके मामा का घर यहां से 3 किमी दूर है, तो क्या आपको इस बस्ती की हालत नहीं दिखती?
बस्तीवासियों ने उपायुक्त से बस्ती में तत्काल आंगनबाड़ी केंद्र खोलने, सभी पात्रों को अबुआ आवास, शौचालय, राशन कार्ड देने और नाली-रास्ता निर्माण की मांग की है।
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