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सरायकेला : छऊ की थाप, बाउल की तान और लोककला का संगम, केतुंगा में सजा सांस्कृतिक महाकुंभ, तीन दिवसीय हेरिटेज फेस्टिवल शुरू

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Oct 30, 2026
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सरायकेला-खरसावां जिले के नीमडीह प्रखंड अंतर्गत केतुंगा स्कूल मैदान में शुक्रवार को तीन दिवसीय झारखंड लिविंग हेरिटेज फेस्टिवल 2026 का भव्य शुभारंभ हुआ। 30 अक्टूबर से 1 नवंबर तक आयोजित इस महोत्सव में झारखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति, पारंपरिक नृत्य, संगीत, कठपुतली और हस्तशिल्प की अनूठी झलक देखने को मिल रही है।

 

कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्य अतिथि प्रखंड विकास पदाधिकारी कुमार एस अभिनव ने पौधे में पानी डालकर किया।

 

इस अवसर पर बीडीओ ने कहा कि ऐसे आयोजन हमारी पारंपरिक सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के साथ स्थानीय कलाकारों को अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का अवसर प्रदान करते हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्र की लोककलाओं को व्यापक पहचान मिलेगी और कलाकारों के लिए आजीविका के नए रास्ते भी खुलेंगे।

 

महोत्सव का आयोजन कॉन्टैक्ट बेस और बांग्लानाटक डॉट कॉम की ओर से एक्सिस बैंक फाउंडेशन के सहयोग से किया जा रहा है। यह ‘रूट्स टू प्रॉस्पेरिटी: बिल्डिंग सस्टेनेबल लाइवलीहुड्स थ्रू हेरिटेज’ पहल का हिस्सा है। संस्था सरायकेला-खरसावां जिले में 2600 से अधिक पारंपरिक कलाकारों और शिल्पकारों के साथ काम कर रही है। इनमें छऊ नर्तक, बांस शिल्पकार, काशी घास और साल के पत्तों से विभिन्न कलाकृतियां तैयार करने वाले कारीगर शामिल हैं।

 

आयोजन से जुड़ी अभिप्सा घोष ने बताया कि महोत्सव में सरायकेला, खरसावां, मानभूम और मयूरभंज छऊ के अलावा बाउल संगीत और कठपुतली कला की प्रस्तुतियां आकर्षण का केंद्र रहेंगी।

 

उद्घाटन समारोह में मां भार्गोबी छऊ दल ने गुरु विजय कुमार साहू के नेतृत्व में सरायकेला छऊ की शानदार प्रस्तुति दी। इसके बाद उस्ताद परेश कुमार के नेतृत्व में पुरुलिया छऊ डांस अकादमी ने मानभूम छऊ नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया।

 

31 अक्टूबर को रंजन राय एवं समूह द्वारा कठपुतली कला, नंदलाल कुम्हार के नेतृत्व में खरसावां छऊ तथा कार्तिक कर्मकार के नेतृत्व में मानभूम छऊ की प्रस्तुति होगी। वहीं 1 नवंबर को बाउल संगीत और मयूरभंज एवं मानभूम छऊ के कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करेंगे।

 

महोत्सव में केतुंगा, राजागोरा, भांगाट, तेंतलो और चिरुगोरा के स्थानीय कलाकार बांस की टोकरी, काशी घास के शिल्प और क्रोशिया कला की प्रदर्शनी भी लगा रहे हैं। आयोजकों को उम्मीद है कि इस पहल से पारंपरिक कला और शिल्प को नई पहचान मिलेगी तथा ग्रामीण कलाकारों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का अवसर प्राप्त होगा।


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