
ईचागढ़ : सरायकेला खरसावां जिले के ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र में इन दिनों ग्रामीणों के बीच हाथियों की खूब चर्चा है। लोग पूछ रहे हैं- हाथी आए कहां से? पर असल सवाल यह है कि वन्य जीव-जंतु मानव जीवन से पहले आए या मानव समुदाय? यह बात बहुत ही महत्वपूर्ण है।

*हमने छीना उनका अधिकार:* ग्रामीणों का कहना है कि सभी लोग SC-ST, OBC की बातें करते हैं, परन्तु मनुष्य को सोचना चाहिए कि हाथी जाएंगे कहां? गांव में पहुंच जाते हैं तो खदेड़े जाते हैं, शहरी क्षेत्र में जाते हैं तो बवाल मच जाता है। आखिर उनके आश्रय स्थल से छेड़छाड़ कौन कर रहा है?

*जंगल में नहीं रहा भोजन-पानी:* जंगल में भोजन-पानी पर्याप्त उपलब्ध नहीं है। जंगल में आग लगती है, पेड़-पौधों की कटाई होती है और अवैध गतिविधियों से जंगल पर कब्जा हो रहा है। भाई, हाथी के बारे में तो सोचो। वह भी ईश्वर द्वारा रचा गया है। उसे भी जीने का अधिकार है।
*एक नदी का पानी पीते थे साथ:* एक समय था जब मानव जीवन और वन्य जीव-जंतु एक ही नदी का पानी पीते थे। आज भेदभाव क्यों? उसको भी जीने का अधिकार है। उसके अधिकार को हम लोगों ने छीना है। उसे भी शांति से रहने दो।
*कॉरिडोर हो रहे खत्म:* दलमा से पलायन कर हाथी अब ईचागढ़, कुकड़ू, चांडिल क्षेत्र में घूम रहे हैं। उनके परंपरागत कॉरिडोर में खनन, सड़क, बस्तियां और खेत बन गए हैं। नतीजा- मानव-हाथी संघर्ष बढ़ रहा है।
स्थानीय बुजुर्ग कहते हैं कि विकास जरूरी है, पर जंगल और वन्यजीवों की कीमत पर नहीं। अगर हाथियों को उनका घर, भोजन और रास्ता नहीं देंगे तो वे गांव-शहर में ही भटकेंगे। प्रशासन और समाज दोनों को सोचना होगा कि हम उनके हिस्से की जमीन पर कब्जा कर उन्हें ‘अतिक्रमणकारी’ कैसे कह सकते हैं?
There is no ads to display, Please add some


Post Disclaimer
स्पष्टीकरण : यह अंतर्कथा पोर्टल की ऑटोमेटेड न्यूज़ फीड है और इसे अंतर्कथा डॉट कॉम की टीम ने सम्पादित नहीं किया है
Disclaimer :- This is an automated news feed of Antarkatha News Portal. It has not been edited by the Team of Antarkatha.com
