
हजारीबाग: स्वास्थ्य बीमा का क्लेम बेवजह खारिज करना एक बीमा कंपनी को काफी भारी पड़ गया है। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, हजारीबाग ने बीमा कंपनी की इस कार्रवाई को सेवा में कमी माना है। आयोग ने कंपनी को आदेश दिया है कि वह शिकायतकर्ता सुरेश प्रसाद केसरी को 5 लाख रुपये की पूरी बीमा राशि 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ चुकाए। इसके अलावा कंपनी को मानसिक प्रताड़ना के लिए मुआवजा और कानूनी खर्च भी देना होगा।
यह फैसला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष शिव कुमार शुक्ला और सदस्य प्रेम कुमार सिंह की पीठ ने 6 अक्टूबर 2026 को सुनाया।

क्या है पूरा मामला?

चौपारण के रहने वाले सुरेश प्रसाद केसरी ने एक बीमा कंपनी से 5 लाख रुपये का हेल्थ इंश्योरेंस लिया था। साल 2019 में अचानक सांस लेने की तकलीफ के बाद उन्हें इलाज के लिए पहले कोलकाता और फिर गुरुग्राम के अस्पतालों में भर्ती कराया गया। वहाँ उनके दिल का ऑपरेशन (बाईपास सर्जरी) हुआ, जिसमें करीब 8.5 लाख रुपये से अधिक का खर्च आया।
जब उन्होंने इलाज के खर्च की भरपाई के लिए कंपनी के पास क्लेम भेजा, तो कंपनी ने यह कहते हुए इसे खारिज कर दिया कि सुरेश को पहले से दिल की बीमारी थी और उन्होंने पॉलिसी लेते समय यह बात छुपाई थी।
आयोग ने उपभोक्ता के हक में सुनाया फैसला
कंपनी के इस रवैये के खिलाफ सुरेश प्रसाद केसरी ने अपने वकील शंभू नाथ अग्रवाल के माध्यम से जिला उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया। आयोग ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और दस्तावेजों की जांच करने के बाद कंपनी के दावों को गलत पाया।
आयोग ने बीमा कंपनी को निम्नलिखित भुगतान करने का आदेश दिया है:
• बीमा राशि: ₹5,00,000 (7% सालाना ब्याज के साथ)
• मुआवजा (मानसिक परेशानी के लिए): ₹15,000
• मुकदमा खर्च: ₹10,000
60 दिनों की समय सीमा, वरना बढ़ेगा ब्याज
आयोग ने अपने आदेश में यह साफ कर दिया है कि बीमा कंपनी को यह पूरी रकम फैसले की तारीख से 60 दिनों के भीतर चुकानी होगी। अगर कंपनी तय समय में भुगतान करने में नाकाम रहती है, तो ब्याज की दर 7 प्रतिशत से बढ़ाकर 9 प्रतिशत सालाना कर दी जाएगी।
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