
कर्मकार ने कहा कि दलमा तराई क्षेत्र जैसे ईको सेंसिटिव जोन प्रकृति, वन्यजीव और स्थानीय समुदायों की सुरक्षा के लिए बनाए गए हैं। इन क्षेत्रों में पर्यावरण संरक्षण कानूनों के तहत निर्माण कार्य, खनन और व्यावसायिक गतिविधियों पर सख्त नियम लागू होते हैं। लेकिन आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ये नियम सभी पर समान रूप से लागू हो रहे हैं?
*”गरीब पर तुरंत कार्रवाई, अमीर को छूट”*

प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि जब कोई गरीब परिवार जंगल किनारे छोटी झोपड़ी बनाता है, खेती के लिए जमीन समतल करता है या अपने जीवनयापन के लिए लकड़ी-पत्थर का उपयोग करता है, तब प्रशासन और वन विभाग तुरंत कार्रवाई करने पहुंच जाता है। गरीबों पर जुर्माना, केस, नोटिस और डर का माहौल बना दिया जाता है। उन्हें कानून का पाठ पढ़ाया जाता है और पर्यावरण संरक्षण के नाम पर दबाव डाला जाता है।

लेकिन दूसरी ओर, बड़े कॉरपोरेट घरानों, प्रभावशाली लोगों और पैसे वालों के लिए यही कानून अक्सर कमजोर पड़ जाते हैं। ईको सेंसिटिव जोन में बड़े-बड़े भवन, रिसॉर्ट, व्यावसायिक ढांचे और अवैध निर्माण वर्षों से चल रहे हैं। चांडिल, नीमडीह और पटमदा क्षेत्र में कई जगह पहाड़ों की कटाई और जंगल के भीतर कॉलोनी निर्माण की शिकायतें हैं, पर कार्रवाई नहीं होती।
*ग्राम सभा ने उठाई मांग*
गुरचरण कर्मकार ने आरोप लगाया कि दलमा अभयारण्य से सटे इलाकों में हाथी कॉरिडोर बाधित कर अवैध खनन और निर्माण हो रहे हैं, जबकि वनाधिकार कानून के तहत ग्राम सभा की अनुमति लिए बिना ही परियोजनाओं को हरी झंडी दी जा रही है।
मंच ने मांग की है कि:
1. ईको सेंसिटिव जोन में सभी अवैध व्यावसायिक निर्माण और खनन की जांच हो।
2. कानून गरीब-अमीर सब पर एक समान लागू हो।
3. वनाधिकार कानून 2006 के तहत ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य की जाए।
4. गरीब-आदिवासी परिवारों का उत्पीड़न बंद हो।
कर्मकार ने चेतावनी दी कि यदि प्रशासन का दोहरा रवैया नहीं बदला, तो दलमा तराई क्षेत्र की ग्राम सभाएं आंदोलन करेंगी। उन्होंने कहा, “प्रकृति सबकी है तो नियम भी सबके लिए एक होने चाहिए। कानून सिर्फ झोपड़ी पर नहीं, महलों पर भी लागू हो।”
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