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SIR को रद्द करने की घोषणा के साथ दो-दिवसीय समावेश सम्पन्न

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Byadmin

Apr 28, 2026
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आज स्टेन स्वामी जयंती के अवसर पर झारखंड जनाधिकार महासभा और बगाईचा सोशल सेंटर द्वारा आयोजित दो-दिवसीय जन कार्यक्रम का दूसरा दिन स्टेन स्वामी को पुष्पांजलि और स्मरण गीत के साथ शुरू हुआ। पहले सत्र में अर्थशास्त्री एवं सामाजिक कार्यकर्ता परकाला प्रभाकर का व्याख्यान हुआ| दूसरे सत्र में झारखंड में प्रस्तावित SIR के विरोध और उसके दुष्प्रभावों से बचने के लिए रणनीति एवं कार्ययोजना पर विस्तृत चर्चा हुई। गौरतलब है कि 25 अप्रैल को महासभा द्वारा कार्यकर्ताओं, रांची के सजग नागरिकों और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ संवाद, प्रेस वार्ता और विमर्श के सत्र आयोजित किए गए थे।

अपने वक्तव्य में परकाला प्रभाकर ने स्पष्ट कहा कि SIR मतदाता सूची के “शुद्धिकरण” का साधन नहीं, बल्कि एक योजनाबद्ध तरीके से मतदाताओं को हटाने की प्रक्रिया है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब मुख्य चुनाव आयुक्त के स्तर पर यह कहा जा रहा है कि SIR पर कोई निर्णय नहीं हुआ है, तो यह प्रक्रिया किस आधार पर चल रही है? 2002-03 में भी मतदाता सूची का पुनरीक्षण हुआ था, लेकिन उस समय लोगों से इस तरह दस्तावेज़ नहीं मांगे गए थे। आज अचानक दस्तावेज़ आधारित सत्यापन की शर्त क्यों? उन्होंने बताया कि असम में जहाँ केवल SR हुआ, वहाँ सीमित स्तर पर नाम हटे, लेकिन जिन राज्यों में SIR लागू हुआ, वहाँ बड़े पैमाने पर मतदाताओं को हटाया गया है।

उन्होंने चेतावनी दी कि SIR का निशाना सबसे ज्यादा मुस्लिम, दलित, आदिवासी, महिलाएं और संपत्तिहीन लोग बन रहे हैं। पश्चिम बंगाल का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि जब दस्तावेज़ के आधार पर नाम हटाना मुश्किल हुआ, तो “लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी” (नाम, उम्र आदि में अंतर) के आधार पर लाखों लोगों को सूची से बाहर कर दिया गया, जिनका समाधान अब तक नहीं हुआ और वे मतदान से वंचित रह गए। उन्होंने कहा कि बार-बार SIR कर अधिक से अधिक मतदाताओं को हटाने की आशंका है, और एक बार नाम हटने के बाद वोटरों की खैर-खबर लेने राजनीतिक दल तो आयेंगे नहीं, ऐसे लोग “अनाथ मतदाता” बन जाते हैं।

प्रभाकर ने जोर देकर कहा कि हमारी भूमिका SIR को स्वीकार करने की नहीं, बल्कि इसका विरोध करने की होनी चाहिए। यदि इसे पूरी तरह रोकना संभव न हो, तब भी इसके दुष्प्रभाव कम करने और इसकी मंशा को उजागर करने के लिए सक्रिय हस्तक्षेप जरूरी है। उन्होंने चुनाव आयोग के मैनुअल का हवाला देते हुए कहा कि मतदाता सूची का सत्यापन ग्राम सभा और वार्ड सभा के माध्यम से होना चाहिए। साथ ही उन्होंने सुझाव दिया कि राज्य स्तर पर स्वतंत्र सर्वेक्षण कराकर मतदाता सूची तैयार की जाए और उसके आधार पर केंद्रीय (सीईसी) सूची की विसंगतियों को चुनौती दी जाए। खतियान और स्व-प्रमाणित वंशावली को भी पहचान के वैध दस्तावेज़ के रूप में मान्यता देने की मांग उठाई गई।

यह बात मुख्य रूप से उभरी कि वोट अधिकार और नागरिकता बचाने की लड़ाई राजनीतिक दलों के भरोसे नहीं, नागरिकों की एकजुट पहल से ही आगे बढ़ सकती है। चर्चा में परिसीमन के खतरों को भी पहचाना गया। परिसीमन से ऐसी परिस्थिति भी आ सकती है कि दक्षिण और कुछ अन्य प्रांतों में एक भी सीट नहीं आने पर भी, दो तीन राज्यों के बहुमत से भी पूरे भारत की सरकार बन सकती है। तब कुछ प्रांत विशेष सुविधा पायेंगे और कुछ राज्य हमेशा वंचित रह जाएंगे।इस दौरान कर्नाटक से तारा राव (एड्डेलु कर्नाटक) और पश्चिम बंगाल से कस्तूरी ने अपने-अपने राज्यों के अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि SIR जैसी प्रक्रियाओं को जमीनी स्तर पर कैसे चुनौती दी जा सकती है और उन्होंने लोगों से अपील की कि वे अभी से संगठित होकर तैयारी करें, “हमारा हक है जानना” के सिद्धांत पर सार्वजनिक जवाबदेही तय करें और हर स्तर पर प्रक्रिया की निगरानी रखें।

बैठक के अंत में जनघोषणा सर्वसम्मति से पारित हुई, जिसमें SIR को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे वोट के बुनियादी अधिकार पर हमला बताया गया। मांग की गई कि मतदाता सूची का सत्यापन केवल ग्राम सभा/वार्ड सभा से हो, खतियान व वंशावली को वैध दस्तावेज़ माना जाए और एक भी योग्य मतदाता का नाम न हटे। महासभा ने पश्चिम बंगाल के वंचित मतदाताओं के संघर्ष के साथ एकजुटता जताते हुए देशभर में जनप्रतिरोध को मजबूत करने का आह्वान किया और सभी संगठनों व नागरिकों से इस मुद्दे पर संगठित होकर आगे आने की अपील की।

_अधिक जानकारी के लिए प्रवीर पीटर (7979848955), एलिना होरो (9939559039), मंथन (9430305551), सिराज (9939819763), अफ़ज़ल अनीस (9234982712) या टॉम कावला (7632034579) से संपर्क करें।_


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