
सरायकेला : चांडिल अनुमंडल क्षेत्र में दलमा वन्य प्राणी आश्रयणी, जिसे गज परियोजना जमशेदपुर के नाम से जाना जाता है, अब 193.22 के स्थान पर 188.02 वर्ग में सिकुड़ गई है। जहां यह सेंचुरी कभी हाथियों के प्रजनन केंद्र के नाम से जानी जाती थी, आज उसे रेस्क्यू सेंटर का नाम दे दिया गया है। जहां भूले-भटके हाथी के बच्चों को लाकर रखा जाने लगा है, क्योंकि आज के दौर में सेंचुरी में एक भी हाथी देखने को नहीं मिलेगा।
विगत 8 से 10 वर्षों से दलमा गज परियोजना में हाथियों को भोजन, पानी और पौष्टिक आहार पर्याप्त मात्रा में नहीं मिलने के कारण हाथियों के झुंड ने सेंचुरी से पलायन कर लिया है। गजों का झुंड अब ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र में डेरा डाले हुए है। गजों के झुंड ने चांडिल डैम जलाशय के आसपास के जंगल में डेरा डाल रखा है।

सवाल यह उठता है कि आखिर सेंचुरी से पलायन करके हाथी ईचागढ़ क्षेत्र में डेरा क्यों डाले हुए हैं। आज दुर्भाग्य है कि वाइल्ड लाइफ के पदाधिकारी बिछड़े हुए हाथी के बच्चों को संवारने में लगे हैं। जैसे रजनी हथिनी और बादल का नया साथी बनकर नन्हा शेखर पहुंच गया है। एक तरफ दलमा से पलायन करने वाले हाथियों की रोकथाम के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

दलमा वाइल्ड लाइफ सेंचुरी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी है। दूर-दराज से पर्यटक पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, बिहार आदि राज्यों से भ्रमण के लिए पहुंचते हैं। पर्यटक दलमा सेंचुरी में सफारी के दौरान जंगल की प्रकृति को देखने पहुंचते हैं, लेकिन जंगल भ्रमण के दौरान वन्य जीव-जंतु नहीं देख पाने के कारण उनमें मायूसी छा जाती है।
पर्यटकों का कहना है कि विगत कई वर्षों से जंगल भ्रमण के दौरान वन्य जीव नहीं देख पाना एक बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। आखिर सेंचुरी में वन्य जीवों के संरक्षण पर सवाल उठाया जा रहा है। रास्ते में बड़े-बड़े होर्डिंग लगाए गए हैं, जिनमें विभिन्न प्रजाति के वन्य जीवों की तस्वीरें साझा की गई हैं। परंतु सेंचुरी में एक भी हाथी देखने को नहीं मिला। बंदर के सिवा जंगली हाथियों का झुंड देखने को भी नहीं मिलता। थका-हारा पर्यटक माकुलाकोचा चेकनाका हिरण पार्क में रजनी हथिनी और बादल को देखने को पाता है, जिसे रेस्क्यू किया गया हाथी का बच्चा बताया जा रहा है।
पर्यटकों को बढ़ावा देने के लिए जंगल की कटाई करके रिसॉर्ट और कॉटेज बनाए जा रहे हैं, जिससे जंगल 193.22 वर्ग से सिमटता गया। आखिर सेंचुरी से वन्य जीव-जंतु विलुप्त क्यों हो रहे हैं। एक तरफ जंगल की कटाई, दूसरी ओर जंगल में आग लगाना और विषु शिकार के नाम पर वन्य जीव-जंतुओं का सेंदरा करना, इस पर भी सवाल उठ रहे हैं।
एक दौर था, जब वन्य जीव-जंतु विभिन्न जलाशयों में देखने को मिलते थे। हाथियों की बहुलता वाला क्षेत्र माना जाता था। साथ ही यह हाथियों का प्रजनन केंद्र था, जहां पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, उड़ीसा आदि राज्यों से हाथियों के झुंड पहुंचते थे। यहां प्रजनन के बाद नवजात शिशुओं का जन्म होता था और उनका पालन होता था। पर्यटकों को भ्रमण के साथ वन्य जीव-जंतु देखने को मिलते थे। आज के दौर में वन्य जीव-जंतु देख पाना मुश्किल हो गया है। आखिर सेंचुरी से पलायन पर रोक क्यों नहीं लगाई जा रही है।
इसी बीच दलमा वन्यजीव अभयारण्य में अब पर्यटकों को रजनी हथिनी और बादल हाथी के साथ सात माह के नन्हे हाथी शेखर का भी दीदार होगा। सोमवार को शेखर को गुमला वन प्रमंडल से दलमा लाया गया। वन विभाग को उम्मीद है कि यहां का प्राकृतिक वातावरण और बेहतर देखभाल उसके लिए सुरक्षित साबित होगी।
सोमवार को दलमा पहुंचने पर शेखर नए माहौल में काफी चंचल नजर आया। उसे संभालने में वनकर्मियों को काफी मशक्कत करनी पड़ी। बाद में उसके दोनों पैरों में रस्सी बांधकर नियंत्रित किया गया। इसके बाद रजनी हथिनी के महावत ने अपने हाथों से उसे भोजन कराया।
दलमा में पहले से मौजूद रजनी और बादल पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र हैं। शेखर के आने से अभयारण्य में हाथियों की संख्या बढ़ गई है। अब वन विभाग के सामने उसे उचित भोजन, देखभाल और सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी है। उम्मीद है कि रजनी और बादल के साथ रहने से शेखर यहां के माहौल में ढल सकेगा। पर्यटकों को भी अब इस नन्हे मेहमान को देखने का अवसर मिलेगा।
लेकिन बड़ा सवाल अब भी वही है, रेस्क्यू किए गए हाथियों से सेंचुरी की पहचान नहीं बचेगी। जब तक जंगल, भोजन, पानी और सुरक्षा नहीं मिलेगी, तब तक पलायन नहीं रुकेगा और दलमा अपनी असली पहचान खोता रहेगा।
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