
सरायकेला-खरसावां झारखंड आंदोलन के इतिहास में 21 अक्टूबर 1982 का तिरुलडीह गोलीकांड संघर्ष और बलिदान की अमिट याद है। इस गोलीकांड में अजीत महतो और धनंजय महतो शहीद हुए थे। लेकिन 44 साल बाद भी शहीद धनंजय महतो के परिवार को सरकारी नौकरी का वादा पूरा नहीं हुआ है।
*विस्थापित अधिकार मंच फाउंडेशन के अध्यक्ष राकेश रंजन महतो* ने इस पर सरकार और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि शहादत दिवस पर श्रद्धांजलि और मंच से बड़े भाषण तभी सार्थक होंगे, जब शहीदों के परिवार को उनका हक भी मिलेगा।
राकेश रंजन महतो ने बताया कि 21 अक्टूबर 1982 को तत्कालीन ईचागढ़ प्रखंड मुख्यालय तिरुलडीह में क्षेत्र को सूखाग्रस्त घोषित करने की मांग को लेकर धरना-प्रदर्शन हो रहा था। इसी दौरान पुलिस फायरिंग में अजीत महतो और धनंजय महतो की जान चली गई। यह घटना झारखंड आंदोलन के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है।
परिवार के अनुसार शहीद धनंजय महतो की पत्नी बारी देवी और पुत्र उपेन महतो को नौकरी सहित अन्य सुविधाएं देने का आश्वासन दिया गया था। वर्ष 2007 में तत्कालीन मंत्री बंधु तिर्की ने परिवार से मुलाकात की थी, तो वर्ष 2009 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिबू सोरेन ने शहादत दिवस के मौके पर नौकरी का आश्वासन दिया था। बावजूद इसके आज तक परिवार को सरकारी नौकरी नहीं मिल सकी है।
उन्होंने कहा कि पूर्व आजसू नेता और वर्तमान भाजपा नेता हरेलाल महतो ने शहीद के परिवार के लिए मकान बनवाया और उनके पुत्र उपेन महतो को अपने यहां काम दिया। यह निजी सहयोग सराहनीय है, लेकिन सरकारी स्तर पर किये गये वादों का क्या हुआ, यह बड़ा सवाल है।
*राकेश रंजन महतो ने कहा -* “शहीदों के नाम पर राजनीति करना आसान है, लेकिन उनके परिवारों को उनका हक दिलाना असली जिम्मेदारी है। अगर सरकार ने नौकरी देने का आश्वासन दिया था, तो 44 साल बाद भी परिवार इंतजार क्यों कर रहा है? सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि मामला कहां अटका है और शहीद के परिवार को न्याय कब मिलेगा।”
उन्होंने कहा कि हर साल शहादत दिवस पर श्रद्धांजलि सभाएं होती हैं, लेकिन शहीदों के परिवारों की समस्याओं पर ठोस कार्रवाई भी होनी चाहिए। सरकार को पुराने आश्वासनों की समीक्षा कर स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए, ताकि परिवार को बार-बार उम्मीद लेकर दर-दर भटकना न पड़े।
सच्ची श्रद्धांजलि केवल माल्यार्पण और भाषणों से नहीं, बल्कि शहीद परिवारों के सम्मान, अधिकार और भविष्य की सुरक्षा सुनिश्चित करने से मिलेगी। 44 साल का इंतजार अपने आप में गंभीर सवाल है। अब जरूरत नये आश्वासनों की नहीं, बल्कि जवाबदेही और ठोस कार्रवाई की है।
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