
सरायकेला : कांदरबेड़ा से दोमुहानी तक 7.996 किलोमीटर फोर-लेन सड़क परियोजना की बेहद धीमी प्रगति को लेकर विस्थापित अधिकार मंच फाउंडेशन के अध्यक्ष राकेश रंजन महतो ने झारखंड सरकार और सड़क निर्माण विभाग पर तीखा हमला बोला है।
उन्होंने कहा कि ₹101.07 करोड़ की प्रशासनिक स्वीकृति वाली सड़क परियोजना की निर्धारित पूर्णता तिथि 24 मार्च 2026 बीत चुकी है, लेकिन सरकारी प्रगति रिपोर्ट में अप्रैल 2026 तक भौतिक प्रगति मात्र 22% दर्ज है।

उन्होंने सवाल उठाया — “जब सरकार करोड़ों रुपये की योजना स्वीकृत करती है, टेंडर होता है, एग्रीमेंट होता है और संवेदक को भुगतान भी किया जाता है, तो फिर सड़क जमीन पर क्यों नहीं बनती? आखिर जनता के पैसे का हिसाब कौन देगा?”

सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार परियोजना की प्रशासनिक स्वीकृति लगभग ₹101.07 करोड़ है, जबकि एग्रीमेंट राशि लगभग ₹67.25 करोड़ दर्ज है। जुलाई 2025 में भौतिक प्रगति 18% और वित्तीय प्रगति 6% थी। अप्रैल 2026 तक भी भौतिक प्रगति सिर्फ 22% और वित्तीय प्रगति 16% दर्ज हुई।
*”चार साल की प्रक्रिया के बाद भी सड़क अधूरी क्यों?”*
राकेश रंजन महतो ने कहा कि जनता को यह समझना होगा कि सड़क की घोषणा और शिलान्यास विकास नहीं होता, सड़क का समय पर और गुणवत्तापूर्ण निर्माण ही वास्तविक विकास है।
उन्होंने कहा — “ईचागढ़ की जनता को कागज पर करोड़ों की योजनाएं नहीं चाहिए। जनता को चलने लायक सड़क चाहिए। अगर निर्धारित समय सीमा समाप्त होने के बाद भी काम 22 प्रतिशत पर खड़ा है, तो जिम्मेदारी तय होनी ही चाहिए।”
उन्होंने विभाग से पूछा कि क्या संवेदक के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई? क्या विलंब के लिए जुर्माना लगाया गया? क्या समय विस्तार दिया गया? यदि दिया गया तो किस आधार पर?
*”भुगतान और काम के अनुपात का सार्वजनिक हिसाब हो”*
राकेश रंजन महतो ने कहा कि परियोजना में भौतिक प्रगति और वित्तीय प्रगति के बीच संबंध को लेकर भी जनता के मन में सवाल हैं।
उन्होंने मांग की कि विभाग सार्वजनिक रूप से बताए —
1. अब तक संवेदक को कुल कितनी राशि का भुगतान किया गया?
2. किस-किस मद में भुगतान किया गया?
3. भुगतान के समय परियोजना की वास्तविक भौतिक प्रगति कितनी थी?
4. काम में देरी के लिए संवेदक पर क्या कार्रवाई की गई?
5. क्या विभाग ने गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच कराई है?
6. क्या परियोजना की लागत और समय सीमा में कोई संशोधन हुआ है?
7. क्या किसी अधिकारी या संवेदक की जिम्मेदारी तय की गई है?
उन्होंने कहा — “जनता के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब काम की रफ्तार इतनी धीमी है तो भुगतान की प्रक्रिया इतनी तेज क्यों है? यह सवाल जांच का विषय है और सरकार को इसका जवाब देना चाहिए।”
*”कमीशनखोरी के आरोपों की जांच हो, सिर्फ बयानबाजी नहीं”*
राकेश रंजन महतो ने कहा कि क्षेत्र में लगातार यह धारणा बन रही है कि सड़क परियोजनाओं में निर्माण से ज्यादा कागजी प्रक्रिया और भुगतान महत्वपूर्ण हो गया है।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि किसी व्यक्ति या विभाग पर कमीशनखोरी का आरोप बिना जांच के प्रमाणित नहीं किया जा सकता, लेकिन जब किसी परियोजना में समय सीमा खत्म हो जाए और काम बेहद पीछे रह जाए, तब भुगतान, गुणवत्ता, मापी पुस्तिका और विभागीय निगरानी की जांच जरूरी हो जाती है।
उन्होंने कहा — “अगर सब कुछ नियम के अनुसार हुआ है तो सरकार जांच से क्यों डरे? भुगतान का पूरा हिसाब सार्वजनिक कीजिए और जनता के सामने दूध का दूध, पानी का पानी कर दीजिए।”
*”संवेदक पर कार्रवाई होगी या राजनीतिक संरक्षण मिलेगा?”*
राकेश रंजन महतो ने सरकार से सीधा सवाल करते हुए कहा कि यदि संवेदक की लापरवाही से परियोजना में देरी हुई है तो नियमों के अनुसार कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है?
उन्होंने पूछा — “क्या सरकार में इतनी हिम्मत है कि दोषी पाए जाने पर बड़े संवेदक के खिलाफ कार्रवाई कर सके? या फिर करोड़ों की परियोजनाओं में भी आम जनता की आवाज दबा दी जाएगी?”
उन्होंने कहा कि यदि जांच में गंभीर लापरवाही या नियमों का उल्लंघन साबित होता है तो संवेदक के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई, वसूली और नियमों के अनुसार ब्लैकलिस्टिंग तक की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।
*”ईचागढ़ को सड़क चाहिए, बहाने नहीं”*
राकेश रंजन महतो ने कहा कि ईचागढ़ विधानसभा की जनता लंबे समय से सड़क, पुल और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े सवाल उठा रही है।
उन्होंने कहा — “चुनाव के समय सड़क विकास का मुद्दा बनती है, लेकिन चुनाव के बाद वही सड़कें विभागीय फाइलों में दब जाती हैं। अब यह नहीं चलेगा। जनता जाग चुकी है और हर योजना का हिसाब मांगेगी।”
उन्होंने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि कांदरबेड़ा-दोमुहानी सड़क परियोजना सहित ईचागढ़ क्षेत्र की सभी लंबित सड़क योजनाओं की प्रगति, भुगतान और गुणवत्ता का सार्वजनिक ऑडिट कराया जाए।
*”जनता के पैसे का हिसाब जनता को देना होगा”*
राकेश रंजन महतो ने कहा कि यह किसी एक सड़क का सवाल नहीं है, बल्कि सरकारी धन, प्रशासनिक जवाबदेही और ईचागढ़ की जनता के अधिकार का सवाल है।
उन्होंने कहा — “₹101 करोड़ की स्वीकृति वाली परियोजना में समय सीमा खत्म होने के बाद सिर्फ 22 प्रतिशत काम — यह सामान्य स्थिति नहीं हो सकती। सरकार और विभाग को जवाब देना होगा कि देरी क्यों हुई, पैसा कहां गया, काम क्यों रुका और जिम्मेदार कौन है।”
उन्होंने मांग की कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय एवं निष्पक्ष जांच कर रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए तथा दोषी पाए जाने वाले अधिकारी और संवेदक पर बिना किसी राजनीतिक दबाव के कार्रवाई की जाए।
*”अब विकास के नाम पर सिर्फ कागज नहीं चलेगा। ईचागढ़ की जनता सड़क का काम भी देखेगी और करोड़ों रुपये का हिसाब भी मांगेगी।”*
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