

धनबाद: अल-इकरा टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज में विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर आदिवासी संस्कृति, परंपरा, लोकगीत और लोकनृत्य को समर्पित एक भव्य एवं रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस विशेष आयोजन में महाविद्यालय के बी.एड. प्रशिक्षुओं ने अत्यंत उत्साह के साथ हिस्सा लिया और अपनी शानदार एवं ऊर्जावान प्रस्तुतियों के माध्यम से झारखंड की समृद्ध आदिवासी और लोक संस्कृति की मनमोहक झलक प्रस्तुत की। 
कार्यक्रम के दौरान संपूर्ण महाविद्यालय परिसर पारंपरिक गीत-संगीत और नृत्य की स्वरलहरियों से सराबोर नजर आया।

कार्यक्रम की शुरुआत प्रोफेसर अशरफ अली के प्रेरणादायक संबोधन से हुई। उन्होंने आदिवासी दिवस के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए कहा कि आदिवासी समाज की अनूठी संस्कृति, भाषा, समृद्ध परंपरा, कला और प्रकृति के प्रति उनका अटूट व गहरा लगाव हमारी संपूर्ण भारतीय सांस्कृतिक विरासत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने सभी प्रशिक्षुओं से आह्वान किया कि वे आदिवासी संस्कृति, कला और परंपराओं के संरक्षण तथा उनके प्रति सम्मान भाव बनाए रखने के लिए सदैव आगे आएं।

इस सांस्कृतिक उत्सव के दौरान आदिवासी संस्कृति को समर्पित एक सुंदर और मार्मिक शायरी भी प्रस्तुत की गई, जिसने माहौल में चार चांद लगा दिए—
“जंगल की हरियाली, मिट्टी की पहचान हैं,
आदिवासी संस्कृति भारत की शान हैं।
ढोल की थाप में इतिहास सुनाई देता है,
लोकगीतों में सदियों का सम्मान है।”
सांस्कृतिक प्रस्तुतियों की श्रृंखला में प्रशिक्षु सरस्वती कुमारी ने एक अत्यंत मनमोहक नागपुरी गीत प्रस्तुत किया। उनके गीत के लोकप्रिय बोल “कितना सुंदर सुहाना लागे हमर नागपुर” ने वहां उपस्थित सभी शिक्षकों और विद्यार्थियों को पूरी तरह मंत्रमुग्ध कर दिया। उनकी इस सुरीली प्रस्तुति को दर्शकों ने बेहद सराहा और तालियों की गड़गड़ाहट के साथ उनका उत्साहवर्धन किया।
इसके पश्चात, मनोलाल हांसदा, मीनू बास्की एवं उनके सहयोगियों ने एक शानदार और ऊर्जावान आदिवासी नृत्य प्रस्तुत किया। “एतांग सासंग सारी आसाम दिशोम कुड़ी” के पारंपरिक बोलों पर प्रस्तुत इस पारंपरिक नृत्य ने कार्यक्रम की भव्यता को कई गुना बढ़ा दिया। कलाकारों की पारंपरिक आदिवासी वेशभूषा, उनकी अनूठी नृत्य शैली और लोक संगीत की मनमोहक लय ने उपस्थित सभी दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित किया। नृत्य की इतनी जीवंत और सुंदर प्रस्तुति देखकर दर्शक भी मंत्रमुग्ध होकर झूमने लगे।
इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए करण ने झारखंड की पावन धरती और यहां की माटी से जुड़े एक भावुक गीत की प्रस्तुति दी, जिसके बोल थे—“हे झारखंडी भाई, सोना रकम झारखंड, छोड़ी हमनी परदेश काहे जाए।” इस गीत के माध्यम से झारखंड की प्राकृतिक सुंदरता, यहां की सांस्कृतिक विरासत और अपनी मातृभूमि के प्रति अगाध प्रेम की भावना को बेहद खूबसूरती से अभिव्यक्त किया गया।
इस पूरे कार्यक्रम का बेहतरीन मंच संचालन करण द्वारा किया गया। संचालन के दौरान उन्होंने झारखंड की लोक संस्कृति, परंपराओं, प्राकृतिक संपदा और आदिवासी समाज के गौरवशाली इतिहास से जुड़ी कई महत्वपूर्ण एवं रोचक जानकारियां भी साझा कीं।
इस सफल आयोजन के पीछे महाविद्यालय के सभी शिक्षकों का सक्रिय योगदान रहा। कार्यक्रम को सफल बनाने में डॉ. नादरा रहमान, डॉ. ममता कुमारी सिन्हा, डॉ. नंदन चंद्र पाणि, प्रोफेसर अब्दुल्लाह और प्रोफेसर सत्य नारायण महतो सहित अन्य संकाय सदस्यों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। सभी शिक्षकों ने मिलकर प्रशिक्षुओं का उत्साह बढ़ाया और उनकी उत्कृष्ट कलात्मक प्रस्तुतियों की खुलकर सराहना की।
अंततः, यह आयोजन केवल मनोरंजन का साधन मात्र नहीं बनकर रहा, बल्कि इसके माध्यम से प्रशिक्षुओं ने आदिवासी संस्कृति, लोककला, स्थानीय भाषा और परंपराओं के संरक्षण तथा उनके प्रति सम्मान की भावना को अपने भीतर और अधिक मजबूत किया। इस कार्यक्रम ने सभी के हृदयों में झारखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के प्रति गर्व और सम्मान की एक गहरी भावना जागृत की।
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