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मनसा पूजा,सांप,बिच्छु व् बरसाती कीड़ों से बचने की लोक परंपरा दी जाती है बतख की बलि

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ByAdmin Office

Aug 18, 2024

 

 

रिपोर्ट,अरुण कुमार सैनी

 

केंदुआ। सांपो की देवी माँ मनसा की पूजा झारखण्ड के अधिकतर गांवों में मनाए जाने वाले प्रमुख त्योहारों में से एक है।जिसे प्रत्येक वर्ष 17 अगस्त को गांवों में जगह जगह प्रतिमा स्थापित कर धूमधाम से माँ मनसा की पूजा की जाती है। लोग कई दिनों पूर्व से ही इसकी तैयारी में जुट जाते है।प्रतिमा बनाने का दौर 15से 20 दिन पहले से शुरू हो जाता है। गांवों में माँ मनसा की पूजा पुरे भक्तिभाव से मनाने के पीछे भी कुछ मान्यताएं है। दर असल कृषि बहुल क्षेत्र होने के कारण अधिकतर ग्रामीणों व् किसानों का नाता सांप बिछुओं के खतरे वाले स्थलों तालाब,पोखर,नदी, नाला,खेत,खलिहान आदि से बना रहता है। ऐसी मान्यता है कि माँ मनसा की पूजा अर्चना से सांप बिछुओं की खतरों से उन्हें सुरक्षा मिलती है।इसी कारण गावँ के लोग माँ मनसा की आराधना पुरे भक्तिभाव से करते है।पूजा की रात बकरा और बतख की बलि देने की परंपरा है।अगले दिन पारन के मौके पर इसे प्रसाद के रूप में लोगों के बीच वितरण किया जाता है। वैसे माँ मनसा की पूजा पुरे एक महीने तक होती है।छोटानागपुर व् संथाल परगना में कुड़मी समुदाय के लोग इसे बारी पूजा के रूप में मनाते है।इनके अनुसार यह कृषि प्रधान पर्व है।धान की खेती कार्य समाप्त होने के बाद इसे मनाने के पीछे अपना तर्क है।और कुछ कुछ वैज्ञानिक आधार भी।कुड़मी समुदाय का मानना है कि इस पूजा के दिन शाम को किसी जलाशय से कलश में पानी लेकर कृषक अपनी अच्छी फसल पैदावार के लिए मनसा वाणी मन की इच्छा के अनुरूप पानी बरसने की कामना करते है।

 

क्यों दी जाती है बतख की बलि

 

मनसा पूजा में बतख की बलि देने के पीछे भी इनका अपना वैज्ञानिक आधार है।इनके अनुसार इस महीने में सभी कृषक खेतों में जाकर कार्य करते है।एक समय था जब प्रायःकृषक खेतों में कार्य के दौरान अपनी प्यास बुझाने के लिए खेत और डांडी का पानी पीते थे।आज भी अधिकतर जगहों पर ऐसी स्थिति बनी हुई है।इनका मानना है कि खेत डांडी का पानी पीने से उसके साथ कई तरह के कीटाणु विषाणु कीड़े मकोड़े भी पेट में चले जाते है।बतख के मांस व् उसके खून में यह खूबी होती है कि वह पेट के सभी वैसे किटाणुओं को नष्ट कर देते है।पुरखों ने उसी को ध्यान में रखते हुए कृषि कार्य के बाद मनाए जाने वाले पर्व में बतख खाने की परंपरा की थी।

 

मनसा पूजा को लेकर है क्या मान्यताएं

 

मनसा पूजा को लेकर कई कथाएं प्रचलित है।उसमे राजा चंद्रभर की कथा सर्वाधिक प्रचलित है।कथा के अनुसार किसी समय माता पार्वती ने माँ काली का भयंकर रूप धारण कर

हजारों दैत्यों का संहार किया था।नागलोक के राजा बासुकी की बहन की मौत हो गई थी।इससे वह काफी दुखी थे।तब भगवान शिव ने अपने मस्तक का प्रभाव से माँ मनसा को जन्म दिया और उसे वासुकी को बहन स्वरूप भेंट किया।वासुकी उसे लेकर नागलोक को निकल पड़े,लेकिन मनसा देवी का जहरीला ताप सहन नही कर पाने के कारण आधे रस्ते में अचेत होकर गिर पड़े। चूँकि शिव ने मनसा के जन्म से पहले विपपान किया था।इसलिए मनसा जन्म से पहले काफी अधिक जहरीली थी।वासुकी ने शिव को पुकारा और कहा कि जब नवजात अवस्था में इसके जहरीले टप को वह सहन नही कर पा रहे तो शिशु अवस्था में यह कन्या कैसे अपना ताप सह सकेगी।तब शिव ने पँचकोश क्रिया से उसे सीधे युवावस्था में पहुंचा दिया।मनसा में अद्भुत चमत्कारी थी,उसके आधार पर मनसा ने पाताल लोक में अधिकार जमाना चाहा।वः चाहती थी की शिव परिवार के गणेश कार्तिक आदि की तरह उनकी भी पूजा हो यह बात शिव को पता चलने पर मनसा को धरती पर अपने भक्त चन्द्रधर के पास जाने की सलाह दी और कहा की अगर वह तुहारी पूजा कर लेगा तो सभी तुम्हारी पूजा स्वीकार कर लेंगें।मनसा ने राजा चन्द्रधर से बलपूर्वक अपनी

पूजा करनी चाही पर वह तैयार नही हुए।उन्होंने कहा कि शिव के अलावा इस दुनिया में अन्य कोई उनका भगवान नही है।इससे क्रोधित मनसा ने एक एक कर उनके सातो पुत्रों को मर डाला उसके बाद चन्द्रधर की पत्नी की प्रार्थना पर मनसा की वरदान से एक पुत्र का जन्म हुआ लक्ष्मी चन्द्र लखिन्द्र उनकी शादी अखण्ड सौभाग्यवान महिला बेहल्या से हुई,लेकिन वहां भी मनसा को अपमानित होना पड़ा।

 

ऐसे शुरू हुई माँ मनसा की पूजा

 

भरपूर प्रयासों के बाद भी जब राजा चन्द्रधर पूजा करने को तैयार नही हुए

तो मनसा ने अपने ही वरदान से जन्मे लक्ष्मीचंद्र को उसके सुहागरात के दिन डस लिया बेहुल्या महान सती थी देवताओं की सलाह पर वह केला के थुम्ब को नौका बनाकर शिव के पास गई शिव ने लक्ष्मीचंद्र को जीवित करने का निर्देश मनसा को दिया

लेकिन वह ऐसा नही कर सकी,उन्हें अपनी गलतियों का एहसास हुआ फिर मनसा के आग्रह पर शिव ने लक्ष्मीचंद्र के अलावे राजा चन्द्रधर के अन्य सातो पुत्रों को भी जीवित कर दिया।इसके बाद शिव ने बेहुल्या की प्रार्थना पर राजा चन्द्रधर को आदेश दिया की वह फूल अर्पित कर मनसा की पूजा करें।साथ ही मनसा को वरदान दिया की वह जगत में देवी के रूप में पूजी जायेगी और उनकी पूजा करने वालों की

सभी मनोकामनाएं पूरी होगी।


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