
नबीनगर से संदीप कुमार की रिपोर्ट
औरंगाबाद जिला के नवीनगर प्रखंड के कांडी गांव स्थित प्राचीन मां गजेन्द्रेश्वरी देवी मंदिर में शुक्रवार को श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ वार्षिक श्रृंगार पूजन एवं स्थापना दिवस समारोह मनाया गया। हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी ग्राम देवी के स्थापना दिवस पर मंदिर परिसर में विशेष पूजा-अर्चना, वैदिक अनुष्ठान एवं भव्य श्रृंगार का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु भक्त शामिल हुए। अहले सुबह से ही मंदिर परिसर भक्तिमय माहौल में डूब गया। मंदिर के प्रधान सेवक गजेन्द्र कुमार सिंह की देखरेख में पूर्व से व्यापक तैयारियां की गई थीं। विद्वान आचार्य ब्रजेश तिवारी के मुखारविंद से वैदिक मंत्रोच्चारण प्रारंभ हुआ, जिसके बीच श्रद्धालुओं ने मंदिर की परिक्रमा कर माता का पूजन किया। मां गजेन्द्रेश्वरी देवी का फूल-माला, बेलपत्र एवं विभिन्न पूजन सामग्रियों से भव्य श्रृंगार किया गया। वैदिक मंत्रों और घंट-घड़ियाल की ध्वनि के बीच माता के दिव्य श्रृंगार की अद्भुत छटा देखते ही बन रही थी। पूजा सम्पन्न होने के बाद माता को भोग अर्पित किया गया तथा श्रद्धालुओं के बीच महाप्रसाद का वितरण किया गया। मंदिर के प्रधान सेवक गजेन्द्र कुमार सिंह ने बताया कि सैकड़ों वर्ष पुराने इस प्राचीन मंदिर का आधुनिक शैली में जीर्णोद्धार कराया गया है।पुनर्स्थापन के बाद प्रत्येक वर्ष 12 जून को मां का स्थापना दिवस श्रद्धा एवं उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष मंदिर का तृतीय स्थापना दिवस समारोह धूमधाम से आयोजित किया गया। स्थानीय श्रद्धालुओं की मान्यता है कि मां गजेन्द्रेश्वरी देवी के दरबार में सच्चे मन से हाजिरी लगाने वाले भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण होती है। रामरेखा नदी के तट पर स्थित यह मंदिर क्षेत्र की प्रमुख धार्मिक आस्था का केंद्र माना जाता है। नवीनगर नगर क्षेत्र से लगभग छह किलोमीटर दूरी पर स्थित इस प्राचीन धाम को लेकर ग्रामीणों के बीच कई लोककथाएं प्रचलित हैं। ग्रामीणों के अनुसार, वर्तमान नवीनगर क्षेत्र का प्राचीन नाम “चनकप गढ़” था, जहां पहले महास्थान समाज के लोग निवास करते थे। वर्षों पूर्व एक परिवार सुरक्षित एवं ऊंचे स्थान की तलाश में वर्तमान कांडी गांव के टिला नुमा स्थल पर पहुंचा और भगवान गणेश का स्मरण कर वहां “कंडी” गाड़कर बस गया। धीरे-धीरे यह स्थान “गणेश कंडी” और बाद में कांडी गांव के नाम से प्रसिद्ध हो गया। कहा जाता है कि गांव बसने के बाद ग्रामीणों को कुल देवता की पूजा के लिए बार-बार चनकप गढ़ जाना पड़ता था। इस कठिनाई को दूर करने के लिए सोखा बाबा मंदिर परिसर की मिट्टी लाकर कांडी गांव में प्रतिमा स्थापित की गई। इसके कुछ दूरी पर देवी पिंडी की स्थापना कर पूजा-अर्चना शुरू हुई, जो आगे चलकर मां गजेन्द्रेश्वरी देवी मंदिर के रूप में प्रसिद्ध हो गई। ग्रामीणों के बीच यह भी मान्यता है कि एक बार रामरेखा नदी में आई भीषण बाढ़ के दौरान गांव डूबने की स्थिति में पहुंच गया था। संकट की घड़ी में ग्रामीणों ने देवी मां से रक्षा की प्रार्थना की, जिसके बाद बाढ़ का पानी थम गया और गांव सुरक्षित बच गया। तभी से माता को ग्राम देवी के रूप में पूजा जाने लगा।

वहीं सोखा बाबा मंदिर परिसर में स्थित विशाल पीपल वृक्ष को भी विशेष धार्मिक महत्व प्राप्त है। स्थानीय लोग इसे लगभग 300 वर्ष पुराना बताते हैं, जो मंदिर की प्राचीनता और ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक माना जाता है। बताया गया कि पुराने जर्जर देवी मंदिर का पुनर्स्थापन विक्रम संवत 2080 एवं शक संवत 1945, आषाढ़ कृष्ण नवमी, सोमवार 12 जून 2023 को गजेन्द्र कुमार सिंह एवं उनकी धर्मपत्नी शिक्षिका अर्पणा कुमारी के माध्यम से कराया गया। वर्तमान में यह मंदिर मां गजेन्द्रेश्वरी देवी के रूप में प्रतिष्ठित है, जहां प्रतिवर्ष भव्य श्रृंगार पूजन एवं स्थापना दिवस समारोह आयोजित किया जाता है।

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