
रिपोर्ट सत्येन्द्र यादव
कुल्टी अपने पुत्रों की दीर्घायु होने की कामना के साथ माताओं ने निर्जला उपवास रहकर जीवित्पुत्रिका का व्रत किया । बताया जाता है कि जितिया व्रत की तीन कहानियां काफी प्रचलित है । जिसे महिलाए अपने पुत्रों को दीर्घायु करने के उद्देश्य से पूरे विधि विधान से व्रत करती है तथा अपनी परंपरा के अनुसार जो कथा उनके यहां पढ़ी जाती हो उसे पढ़ती या सुनती है । जिसमे पहली कथा सियारिन वाली है । दूसरी जीमूतवाहन राजा की और तीसरी भगवान श्री कृष्ण से जुड़ी है । जीमूतवाहन की पूजा की प्रथा महाभारत काल से जुड़ी हुई हैं । महा भारत युद्ध के बाद अपने पिता की मृत्यु के बाद अश्व्थामा बहुत ही नाराज था और उसके अन्दर बदले की भावना सुलग रही थी । जिस कारण उसने पांडवो के शिविर में घुस कर सोते हुए पांच लोगो को पांडव समझकर मार डाला था । लेकिन वे सभी द्रोपदी की पांच संताने थी । उसके इस अपराध के कारण उसे अर्जुन ने बंदी बना लिया और उसकी दिव्य मणि छीन ली । जिसके फलस्वरूप अश्व्थामा ने उत्तरा की अजन्मी संतान को गर्भ में मारने के लिए ब्रह्मास्त्र का उपयोग किया । जिसे निष्फल करना नामुमकिन था । उत्तरा की संतान का जन्म लेना आवश्यक था । जिस कारण भगवान श्री कृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल उत्तरा की अजन्मी संतान को देकर उसको गर्भ में ही पुनः जीवित किया । गर्भ में मरकर जीवित होने के कारण उसका नाम जीवित्पुत्रिका पड़ा और आगे जाकर यही राजा परीक्षित बने । तब से ही इस व्रत को माताओं द्वारा किया जाता हैं । जिसको लेकर बराकर व आस पास के क्षेत्र से भारी संख्या मे मताए दोपहर बाद बराकर नदी तट पहुंच कर स्नान आदि करके निर्जला उपवास रहकर विधिवत पूजा अर्चना कर जीवित पुत्रिका व्रत कथा सुनकर अपने पुत्रों की दीर्घायु होने की कामना की ।

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