
सिंहभूम , उत्कल गौरव मधुसूदन दास विचार मंच के जरिए “विकसित ओडिशा 2036 तथा उसके विछिन्न अंचल ( ओडिशा से बिछड़े ) इलाके की समस्या” को लेकर अन्तर्राज्य स्तर का आलोचना चक्र फतेहपुर मलिया यज्ञ मंडप पर आयोजन हुआ । गोपाल सामल द्वारा आहुत इस कार्यक्रम में , जिसकी अध्यक्षता इलाके के गणमान्य अटल बिहारी नायक (पूर्व सरपंच सह बुद्धिजीवी )ने की। जबकि मुख्य अतिथि के रूप में उत्कल सम्मेलनी के अध्यक्ष प्रोफेसर आदित्य पात्र समेत बड़ी संख्या में क़ानूनविदो , समाज सेवियों यहां तक की महिलाओं ने बढ़-चढ़कर आलोचना चक्र में भाग लिया ।
उत्कल की अधिष्ठात्री देवी मां वीरजा की नगरी जाजपुर के विझारपुर इलाके हुई इस महत्वपूर्ण बैठक का आयोजन स्वतंत्र ओडिशा प्रदेश गठन 1936 से एक सौ वर्ष पुरा होने के दस वर्ष पहले यानी 2026 में यहां ऐतिहासिक समस्या की यह दूसरी बैठक रही ।

उत्कल गौरव मधूसुदन दास के नाम आयोजित इस संगठन का मूल उद्देश्य उनके द्वारा समग्र ओड़िया इलाका एकत्रिकरण व विकास को लेकर रहा । इस बैठक में अपने अध्यक्षीय भाषण में प्रोफेसर अद्वैत पात्र ने कहा ओडिशा प्रदेश गठन के समय 1936 में एक सोची समझी षड्यंत्रकारी कदम के तहत ओडिय़ा भाषी इलाके को ओडिशा से बाहर रखा गया । ओडिशा से बाहर ओड़िया इलाके में भाषा संस्कृति सुरक्षा पर हमेशा हमला हो रहा है ,इसकी उन्होंने तीव्र नींदा की । सनद रहे कि मधूसुदन दास के विशेष प्रयास के कारण रंभा पैलेस के एक बैठक में उत्कल सम्मेलनी का जन्म हुआ था । जिसके मूल कर्णधार उत्कल गौरव मधुसूदन दास ही रहे ।

उक्त इलाके के पूर्व सरपंच अटल बिहारी नायक ने महत्वपूर्ण प्रसंगों पर अपना व्यक्तव्य को बखूबी रखा जो उत्कल गौरव मधुसूदन दास के विचारों मे भाषा , स्वावलंबन एवं तमाम इलाकों का पुनः एकता सुत्र से जोड़ने का रहा । इस आलोचना चक्र में संयोजक रतन लाल भूईयां ने भी मधूसुदन दास के आदर्शो पर चलने को प्रेरित किया । सम्मानित वक्ता के रूप में गजेंद्र कुमार धल, ओड़िशा उच्च न्यायालय के अधिवक्ता विभूति रंजन दास , एडवोकेट देव नारायण मोहान्ती , भूवनानंद सामल आदि ने अपना विचार व्यक्त किए।
मामले को नजदीक से देख रहे
गोपाल सामल ने कहा यह वही स्थल है जहां विगत दिनों महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपदी मूर्मू भी पहुंचकर अपने पूर्वजों निमित्त नाभी गया जाजपुर में पिंडदान कर चुकी हैं । आप इसी उत्कल माटी की होने के साथ साथ ओडिय़ा भाषा लेकर भूवनेश्वर मे पढाई की है । विगत वर्षों में आप झारखंड की गवर्नर रही तब ओडिय़ा भाषा को उचित तरहीज मिलता था आज तहस नहस करने का सिलसिला पुनः बदस्तूर जारी है । जिसे रोकना हर सरकार का प्रथम कर्तव्य बनता है ।
यहां उपस्थित सभी लोगों ने एक स्वर में कहा उत्कल का मसूचा इलाका जो 1936 के पहले अंग्रेज के ओडोनल कमिटी के षड्यंत्रकारी नीति के कारण कुछ बंगाल में तो कुछ बिहार, कुछ मध्यप्रदेश तो कुछ आंध्र प्रदेश में चला गया जिसके लिए मधूसुदन दास लड़ रहे थे, उनके आदर्श को बचाना हर ओड़िया का प्रथम कर्तव्य है ।अंततः 14 तथा 15 दिसंबर को कटक में सरदार पटेल समक्ष शामिल हुआ सरायकेला एवं खरसावां दो ओडिय़ा देशी रियासत भी एक षड्यंत्रकारी कदम के कारण बिहार में एक वर्ष के चला गया था ।उसे लौटाया नहीं जा सका जो , बडी खेद की बात है । सरायकेला , खरसावां , सिंहभूम आज ओड़िया भाषा -संस्कृति, ओडिय़ा लोगों आर्थिक , सामाजिक स्थिति झारखंड सरकार के सौतेले व्यवहार का शिकार है । आलोचना चक्र में गोपीनाथ जेना , कैलाश चंद्र मोहान्ती ,
इसके अलावे सम्मानित अतिथी के रूप में किशोर नगर के उपाध्यक्ष लब कुमार प्रधान अपने दल बल के साथ शिरकत की थी , समाजसेवी टिकिलता बेहरा , टीना पंचायत की सरपंच वीटा रानी मल्लिक आदि भारी संख्या में समाज को विभिन्न इकाइयों में नेतृत्व कर रही महिलाएं शामिल रही । अन्त में धन्यवाद ज्ञापन गोपाल सामल ने किया ।
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