
चक्रधरपुर (पश्चिमी सिंहभूम):

झारखंड के चक्रधरपुर प्रखंड अंतर्गत केरा गांव स्थित माँ केरा मंदिर आस्था, परंपरा और इतिहास का अद्भुत संगम है। करीब 400 वर्षों से अधिक पुराना यह सिद्ध पीठ हर साल अप्रैल माह में आयोजित होने वाले भव्य मेले और अनोखी धार्मिक परंपराओं के लिए पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध है।

चैत्र नवरात्रि के अवसर पर यहां नौ दिनों तक विशेष अनुष्ठान होते हैं, जिसमें झारखंड ही नहीं बल्कि ओडिशा और पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों से हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस दौरान मंदिर परिसर भक्तिमय माहौल से सराबोर रहता है।
*इतिहास और मान्यता:*
केरा राजपरिवार के अनुसार, सदियों पहले कामाख्या मंदिर (कामरूप) से एक सिद्ध साधु माँ भगवती की दिव्य प्रतिमा लेकर केरा पहुंचे थे। उन्होंने नदी किनारे एक वृक्ष के नीचे तपस्या की। उनके ब्रह्मलीन होने के बाद केरा रियासत के राजा को स्वप्न में देवी ने दर्शन देकर मंदिर निर्माण का आदेश दिया। इसके बाद उसी पवित्र स्थान पर माँ केरा मंदिर का निर्माण कराया गया, जहां आज भी पूजा-अर्चना जारी है।
*अग्निपथ और कठोर भक्ति की परंपरा:*
माँ केरा मंदिर की सबसे खास पहचान है श्रद्धालुओं द्वारा नंगे पांव जलते अंगारों पर चलना और कांटों पर लेटकर अपनी आस्था प्रकट करना। मान्यता है कि मनोकामना पूर्ण होने पर भक्त इस कठिन तपस्या के माध्यम से देवी के प्रति कृतज्ञता जताते हैं।
छऊ नृत्य और सांस्कृतिक विरासत:
मंदिर परिसर में हर वर्ष भव्य छऊ नृत्य का आयोजन भी किया जाता है, जो इस क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान को दर्शाता है। लोक मान्यता है कि स्वयं देवी एक बार छऊ नृत्य देखने आई थीं, जिसके बाद यह परंपरा और भी मजबूत हो गई।
*मेला कार्यक्रम (अप्रैल 2026):*
1 अप्रैल: शुभ घट स्थापना
10 अप्रैल: यात्रा घट
11 अप्रैल: वृंदावन यात्रा
12 अप्रैल: गरियाभार यात्रा व छऊ नृत्य (राजपरिवार)
13 अप्रैल: जलाभिषेक
14 अप्रैल: कालिका घट एवं हठभक्ति
माँ केरा मंदिर न सिर्फ एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह आस्था, इतिहास और लोक संस्कृति का जीवंत प्रतीक है, जहां हर साल हजारों लोग अपनी श्रद्धा और विश्वास के साथ पहुंचते हैं।
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