
सरायकेला : पीढ़ियों से चली आ रही है ‘मांगन’ की परंपरा, नृत्य-गीत के साथ मां दुर्गा को खोजने निकलते हैं आदिवासी ।
दुर्गा पूजा शुरू होने से ठीक छह दिन पहले आदिवासी समुदाय में एक अनोखी और सदियों पुरानी परंपरा आज भी जीवित है। इस परंपरा के तहत आदिवासी समुदाय के लोग मां दुर्गा की खोज में गांव-गांव निकल पड़ते हैं।

झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में यह परंपरा बड़े उत्साह से मनाई जाती है।

आदिवासी समुदाय के लोग अपने पारंपरिक वेशभूषा में, सिर पर *मोर पंख* लगाकर, ढोल-नगाड़े और मांदल की थाप पर आदिवासी नृत्य करते हुए मां की खोज में निकलते हैं। वे रास्ते में संथाली भाषा में गीत गाते हुए नजर आते हैं।कोई गुट में बाट कर निकलते हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह रीति-रिवाज उनके पूर्वजों के समय से पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है। नवरात्रि की चतुर्थी दिन से यानी छह दिन पहले वे ‘मांगन’ के लिए निकलते हैं। इस दौरान घर-घर जाकर जो राशि इकट्ठा होती है, उससे गांव के ‘गट गौ माता’ मैदान में सभी समुदाय के लोग एकत्रित होकर मां महिषासुर मर्दिनी की पूजा-अर्चना करते हैं और मिल-जुलकर खुशियां मनाते हैं।
यह सिर्फ पूजा नहीं, बल्कि आदिवासी संस्कृति, एकता और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक है, जो आज भी उसी उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है।
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