
अंतर्कथा : बरही/पंचम पाण्डेय
26 अगस्त 1950 को राजस्थान प्रांत में जन्मे सन्त बालकपूरी जी ने 22 अगस्त 2022 की रात्रि को अपना शरीर पूरा किया और इस संसार को छोड़कर परधाम को चले गए। बताते चलें कि उनकी शिक्षा दीक्षा राजस्थान प्रांत के निजी विद्यालय और महाविद्यालय में हुई। इन्होंने वहीं के विश्वविद्यालय से डबल एम ए की शिक्षा हासिल की। ये अपने पिता रामकृष्ण पूरी की इकलौते संतान थे। इनके पिता भारतीय सेना में कर्नल थे। बाल्यकाल से ही इनके मन में सनातन धर्म और संस्कृति के प्रति काफी प्रगाढ़ता थी। इन्होंने शिक्षा प्राप्ति के साथ साथ संयासी जीवन को अपनाया और अपने सन्यास ग्रहण के पश्चात पूरे देश के शक्तिपीठों और धर्म स्थलों का पैदल भ्रमण किया। इनके अंदर भाषा ज्ञान के साथ साथ धर्म और विथि का भी काफी ज्ञान था। देश भ्रमण के बाद बाबा बालकपूरी सन् 1995 में चौपारण प्रखंड में आये और हजारीबाग जिला के ही होकर रह गए। गंगा माता की प्रेरणा से चौपारण प्रखंड के लराही गांव में डैम के किनारे गंगा मंदिर की स्थापना की। लगभग 15 वर्ष तक उन्होंने चौपारण और बरही में धर्म का अलख जगाने का काम किया और लोगों में सनातन धर्म का भाव प्रगाढ़ किया। गौ माता की प्रेरणा से सन् 2012 में सनातन प्रेमियों को साथ लेकर चौपारण प्रखंड से गौरक्षा आंदोलन की शुरुआत की। लगभग दो वर्षों तक काफी सक्रियता के साथ गौरक्षा कार्य कर हजारों की संख्या में गौवंशीय जीवों को कसाई और तस्करों से बचाया। विश्व हिंदू परिषद की बागडोर भी इन्होंने संभाली और भारतीय गौवंश रक्षण एवं संवर्धन परिषद के हजारीबाग विभाग के विभाग प्रमुख भी रहे। इन्होंने विश्व हिंदू परिषद के धर्म प्रसार विभाग के प्रांत संरक्षक के रूप में भी समाज को सेवा दिया। ये जूना अखाड़े के नागा संयासी थे। इन्होंने अपना संपूर्ण जीवन सनातन समाज को समर्पित कर दिया और 22 नवम्बर 2022 को सदर अस्पताल हजारीबाग में अंतिम सांस ली। बाबा के प्रति श्रद्धा भाव रखने वाले सैकड़ों धर्म प्रेमी इनके अंतिम संस्कार में शामिल हुए।

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