
बोकारो थर्मल/ बेरमो –
डीवीसी बोकारो थर्मल में ऐश मिट 2026 का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में डीवीसी के मेंबर टेक्निकल एसके पांडा मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए, जबकि आईआईटी-आईएसएम के प्रोफेसर डॉ. विश्वजीत पाल ने मुख्य वक्ता के रूप में विषय पर अपने विचार रखे। कार्यक्रम में ऐश से जुड़े व्यवसाय और तकनीकी क्षेत्र से जुड़े लोगों ने भी भाग लिया।

मुख्य अतिथि एसके पांडा ने कहा कि भारत में ऐश के उपयोग और प्रबंधन से संबंधित शोध को और गति देने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि युवा अभियंताओं को ऐश मैनेजमेंट के क्षेत्र में नई तकनीक और उपयोग की संभावनाओं पर काम करना चाहिए। अन्य देशों, विशेषकर चीन में ऐश के क्षेत्र में हो रहे शोध और उसके व्यावहारिक उपयोग का उल्लेख करते हुए उन्होंने भारत में भी अनुसंधान एवं नवाचार को बढ़ावा देने पर जोर दिया।

उन्होंने कहा कि ऐश का उपयोग निर्माण क्षेत्र में ईंट समेत विभिन्न उत्पादों में किया जा रहा है। इससे जुड़े व्यवसायियों को इसकी उपयोगिता बढ़ाने के लिए संस्थान और तकनीकी विशेषज्ञों के साथ मिलकर काम करना चाहिए। उन्होंने ऐश भराव (फिलिंग) से पहले वैज्ञानिक अध्ययन और आवश्यक जांच कराने की जरूरत पर भी बल दिया। उनका कहना था कि बिना शोध के किसी स्थान पर ऐश का भराव करने के बजाय उसके पर्यावरणीय प्रभावों को समझना जरूरी है। उन्होंने इस दिशा में सभी संबंधित पक्षों के सामूहिक प्रयास की आवश्यकता बताई।
मुख्य वक्ता प्रो. डॉ. विश्वजीत पाल ने कहा कि भारत में ऐश पर अपेक्षित स्तर पर शोध नहीं हो रहा है, जबकि चीन सहित कई देशों में इस क्षेत्र में व्यापक कार्य किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि चीन में अनुसंधान के साथ-साथ ऐश के उपयोग के नए तरीके भी विकसित किए जा रहे हैं। भारत में इस क्षेत्र में शोध सुविधाओं और अनुसंधान केंद्रों को बढ़ाने की जरूरत है।
उन्होंने अंगुल और तालचेर क्षेत्र की खदानों से संबंधित प्रस्तुति के माध्यम से ऐश के संभावित उपयोग और प्रबंधन के विभिन्न पहलुओं की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि ऐश को पानी या किसी अन्य स्थान पर निस्तारित करने से पहले उसका वैज्ञानिक परीक्षण जरूरी है। इसके रासायनिक घटकों और संभावित प्रभावों का अध्ययन किए बिना इसका इस्तेमाल या निस्तारण करने से पर्यावरण एवं स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
कार्यक्रम के दौरान ऐश के बेहतर प्रबंधन, अनुसंधान, पुन: उपयोग और पर्यावरणीय सुरक्षा को लेकर तकनीकी जानकारी साझा की गई। वक्ताओं ने ऐश को अपशिष्ट के बजाय उपयोगी संसाधन के रूप में विकसित करने के लिए शोध एवं तकनीकी सहयोग को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया।
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