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चांडिल डैम का जलस्तर 181 मीटर पार, 13 गेट से छोड़ा जा रहा पानी; 40 गांवों में घुसा पानी, धान की फसल डूबी

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Sep 26, 2026
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सरायकेला : चांडिल सुवर्णरेखा बहुउद्देशीय परियोजना के चांडिल डैम का जलस्तर शुक्रवार रात 9 बजे एक बार फिर 181.02 मीटर आरएल पर पहुंच गया। दिनभर पानी छोड़ने के बावजूद जलाशय में पानी की आवक जारी रहने से जलस्तर में वृद्धि हुई, जिसके बाद रात में डिस्चार्ज बढ़ाना पड़ा।

 

विभागीय सूत्रों के अनुसार डैम के 3 रेडियल गेट खोले गए हैं, जिसमें 4 गेट 2.5 मीटर, 5 गेट 2 मीटर और 4 गेट 25 सेंटीमीटर तक खोले गए हैं। रात में अतिरिक्त 260 क्यूमेक्स बढ़ाकर कुल 2020 क्यूमेक्स पानी सुवर्णरेखा नदी में छोड़ा जा रहा है।

 

जलस्तर 181 मीटर पार होते ही ईचागढ़ विधानसभा के नीमडीह, कुकड़ू, चांडिल और ईचागढ़ प्रखंड के 40 से अधिक गांवों के निचले खेतों में पानी घुस गया है। धान की खड़ी फसल और सब्जी डूबने से किसानों में चिंता बढ़ गई है।

 

*सूचना व्यवस्था पर सवाल, ग्राउंड रिपोर्ट को नजरअंदाज करने का आरोप*

 

इस मामले में चांडिल प्रखंड प्रमुख रामकृष्ण महतो और विस्थापित अधिकार मंच फाउंडेशन के अध्यक्ष राकेश रंजन महतो ने संयुक्त रूप से सवाल उठाया है।

 

राकेश रंजन महतो ने कहा कि जिला प्रशासन खरकाई नदी और गांजिया बराज के जलस्तर की जानकारी प्रतिदिन सोशल मीडिया पर सार्वजनिक करता है, लेकिन चांडिल डैम के जलस्तर, गेट और डिस्चार्ज की नियमित जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती।

 

उन्होंने कहा कि विभाग 25 किलोमीटर दूर पातकुम और खोकरो पुल में लगे सेंसर के आधार पर आकलन करता है, जबकि खेत में पानी कहां तक पहुंचा है, कौन सी सड़क डूबी है, इसकी वास्तविक जानकारी ग्रामीणों से ही मिल सकती है।

 

> “कंप्यूटर रूम में बैठकर सिर्फ डेटा देखने से जमीनी हकीकत नहीं समझी जा सकती। विभाग को तकनीकी डेटा के साथ ग्राउंड रिपोर्ट को जोड़कर निर्णय लेना चाहिए। जलस्तर बढ़ने के बाद सूचना देने से ज्यादा जरूरी है, बढ़ने से पहले चेतावनी देना, ताकि लोग अपने बच्चों, बुजुर्गों, मवेशियों और फसल को सुरक्षित कर सकें।” – राकेश रंजन महतो

 

उन्होंने मांग की कि डैम की हर घंटे की जानकारी सार्वजनिक की जाए और रात में अचानक डिस्चार्ज बढ़ाने से पहले गांवों में पूर्व चेतावनी व्यवस्था लागू की जाए।

 

*”मैं खुद विस्थापित हूं, इसलिए दर्द समझता हूं” – प्रमुख रामकृष्ण महतो*

 

चांडिल प्रखंड प्रमुख श्रीराम कृष्ण महतो ने कहा कि वे स्वयं विस्थापित परिवार से आते हैं, इसलिए विस्थापितों का दर्द समझते हैं। उन्होंने कहा कि ईचागढ़, नीमडीह और कुकड़ू प्रखंड सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।

 

प्रमुख ने कहा, “चांडिल डैम का निर्माण 1980-82 में शुरू हुआ, 44 साल बाद भी पूरा नहीं हुआ। यह विस्थापितों को लॉलीपॉप दिखाने जैसा है। बैठक में तय हुआ था कि पानी 180 मीटर आरएल से ऊपर नहीं जाएगा, लेकिन आज 181 मीटर पार कर गया। यह दुर्भाग्य है।”

 

उन्होंने कहा कि आज किसानों का धान, सब्जी और उपजाऊ जमीन डूब रही है। जब ग्रामीण विभाग से शिकायत करते हैं तो जवाब मिलता है कि यह जमीन एक्वायर हो चुकी है, आप यहां क्यों बैठे हैं।

 

> “जो गरीब मछली पकड़कर, खेती करके, सब्जी बेचकर जीवन यापन कर रहा है, अगर डैम के पानी से उसकी जीविका बर्बाद हो रही है तो जिम्मेदार कौन है? झारखंड सरकार डूबे धान का मुआवजा दे।”

 

*डैम का उद्देश्य सिर्फ कंपनियों को पानी देना – आरोप*

 

प्रमुख ने आरोप लगाया कि डैम का नाम बहुउद्देशीय परियोजना है, लेकिन इसका एकमात्र उद्देश्य टाटा, नीलांचल सहित अन्य कंपनियों को पानी देना है। विस्थापितों के पुनर्वास, रख-रखाव और सौंदर्यीकरण के लिए करोड़ों का फंड आता है, लेकिन धरातल पर कुछ नहीं दिखता। इसको लेकर लगाई गई आरटीआई का आज तक जवाब नहीं मिला।

उन्होंने कहा कि ईचागढ़ विधानसभा के सभी जनप्रतिनिधियों की टीम जल्द ही राज्यपाल से मिलकर 40-42 साल पुरानी विस्थापित समस्या को लेकर ज्ञापन सौंपे यदि हक-अधिकार नहीं मिले तो बड़ा आंदोलन किया जाएगा और सरकार को झुकने के लिए बाध्य किया जाएगा।


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