
झारखंड में भाजपा ने एक बड़े राजनितिक दाव खेलते हुए 3आदिवासी नेता को अपने पाले में करने में सफल रहे. इस रणनीति से जहाँ झारखंड मुक्ति मोर्चा को गहरा चोट लगी वहीं आदिवासी वोटों को अपने पक्ष में करने के दिशा में भाजपा का यह सफल चाल बताया जा रहा है.
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पहले गीता फिर सीता और अब चम्पाई सोरेन को झारखंड में शामिल होने से सफल कूटनीतिक चाल माना जा रहा है.

चम्पाई बड़े आदिवासी नेता माने जाते है. वे अपने गृह क्षेत्र में कोल्हान टाइगर के नाम से पहचाने जाते हैं. बिहार-झारखंड बंटवारे में चम्पाई ने शिबू सोरेन के साथ अहम भूमिका निभाई थी . उन्होंने शिबू सोरेन के साथ करीब 2 दशक तक राजनीति की और सुलझे हुए नेता माने जाते हैं.
झारखंड में इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं. सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा अलायंस से मुकाबले के लिए बीजेपी के नेतृत्व वाला NDA रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण और बड़े फैसले ले रहा है. JMM नेता और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का सबसे बड़ा समर्थन आधार झारखंड के आदिवासी और ग्रामीण समुदायों में है और बीजेपी इस वर्ग को अपने पाले में लाने के लिए हरसंभव प्रयास कर रही है. लोकसभा चुनाव से ठीक पहले सोरेन परिवार की बड़ी बहू सीता सोरेन की बीजेपी में एंट्री हुई. उसके बाद राज्य के बड़े आदिवासी नेता और पूर्व सीएम मधु कोड़ा की पत्नी गीता कोड़ा को पार्टी में शामिल कराया.
बीजेपी ने दोनों महिला नेताओं को आम चुनाव में उतारा. हालांकि, ये दांव सफल नहीं हो सका और दोनों चुनाव हार गईं. अब विधानसभा चुनाव की बारी है. चुनाव से ठीक पहले बीजेपी एक और बड़ा दांव खेलने जा रही है और कोल्हान के टाइगर के नाम से मशहूर आदिवासी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री चम्पाई सोरेन (68 साल) की पार्टी में एंट्री होने जा रही है. पूरी स्क्रिप्ट लिखी जा चुकी है. ये एंट्री 30 अगस्त को होगी.
सवाल उठ रहा है कि क्या चम्पाई सोरेन कोल्हान में बीजेपी का सूखा खत्म कर पाएंगे? क्या कोल्हान इलाके के आदिवासी वोट बैंक को बीजेपी के पक्ष में ला पाएंगे? क्या झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) का अभेद्य किला भेद पाएंगे और 14 विधानसभा सीटों में बीजेपी का खाता खोल पाएंगे? इन सभी सवालों के जवाब विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद ही स्पष्ट हो पाएंगे, लेकिन चम्पाई के बीजेपी में शामिल होने की खबरों के बाद कोल्हान की राजनीति में गरमाहट देखने को मिल रही है.
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