
वंदे मातरम् के मन्त्र-दृष्टा, बंगला के शीर्षस्थ उपन्यासकार, भारतीय राष्ट्रवाद के प्रेरक तथा भारतीय इतिहास को एक नई सोच देने का कार्य बंकिमचन्द्र ने किया था।

बंकिमचन्द्र का जन्म 27 जून 1838 को चौबीस परगना के कांटालपाडा में हुआ। इनके पिता यादव चंद्र चट्टोपाध्याय धार्मिक तथा संत विचारों के थे।

बंकिम की शिक्षा कांटालपाडा, मेदिनीपुर, हुगली तथा कलकत्ता में हुई। बंकिम पढाई लिखाई में बचपन से ही बडे़ निपुण थे। वे एक ही बार पढने से पूर्ण वर्णमाला कंठस्थ कर लेते थे। जो भी पुस्तक उनके हाथ आती, वे उसे तुरंत पढ़ डालते। सन् 1858 में वे प्रेसीडेन्सी कॉलेज से विश्वविद्यालय के प्रथम स्नातक बन गये। उन्होंने पुनः प्रेसीडेन्सी कालेज से बी.एल.की परीक्षा प्रथम श्रेणी से पास की थी।
बंकिम के विचार दर्शन एवं चिंतन पर बंगाल के सांस्कृतिक एवं राजनीतिक परिवेश, संस्कृति एवं प्राचीन साहित्य का गंभीर अध्ययन, अंग्रेजी साहित्य तथा भारतीय इतिहास प्रेम को माना जा सकता है।
उन्होंने वैदिक तथा प्राचीन संस्कृत साहित्य का सूक्ष्म अध्ययन किया। वे वेदों, उपनिषदों, पुराणों के महान ज्ञाता थे।
बंकिम बी.ए. पास करते ही डिप्टी मेजिस्ट्रेट के पद पर नियुक्त हो गये तथा कुछ समय बाद डिप्टी कलेक्टर के पद पर पहुँच गये। नौकरी करते हुए, उन्हें जहाँ वंग दर्शन हुआ, वहीं अंग्रेज़ी शासन की मनोवृत्ति तथा दृष्टि का भी प्रत्यक्ष ज्ञान हुआ। एक बार कलकत्ता में ईडन बगीचे मे घुमते हुए अचानक प्रेसिडेंसी कमिश्नर मुनरों को नमस्कार न करने पर उनका तबादला उड़ीसा के जहाजपुर में कर दिया था।
बंकिमचन्द्र यद्यपि पाश्चात्य साहित्य तथा भाषा के अच्छे ज्ञाता थे। परन्तु पाश्चात्य शिक्षा से होने वाले दूरगामी परिणामों के प्रति जागरूक थे। उन्होंने इस के बारे में लिखा कि इस का प्राचीन चिंतन से कोई सम्बन्ध नहीं था।
अंग्रेजी भाषा ने अंग्रेज़ी शासन को सुदृढ़ ही नहीं बनाया, बल्कि पाश्चात्य सभ्यता के प्रति अनुराग भी पैदा किया है। अंग्रेजी पढा-लिखा युवक न केवल अपनी परम्पराओं से टूट गया, बल्कि अपने बड़ों तथा अपने ही परिवार से कट गया।
बंकिमचन्द्र को इतिहास के प्रति लगाव प्रारंभ से था। उन्होंने 13वीं शताब्दी से लेकर 18वीं शताब्दी तक बंग समाज तथा इसके बदलते राजनैतिक, धार्मिक एवं सामाजिक परिवेश का अध्ययन किया।
सामान्यतः मोहम्मद बिन वख्तियार खिलजी के द्वारा बंगाल विजय से अंग्रेज़ों के बंगाल पर प्रशासन तक के काल को, उन्होंने हिन्दू के सतत् संघर्ष के रूप में देखा। इसके साथ ही पठानों द्वारा बंगाल की दुर्दशा, सामाजिक विघटन तथा जबरदस्ती धर्म परिवर्तन को भी दृष्टि-गोचर किया। उन्होंने लिखा कि अंग्रेज़ साम्राज्य में हिन्दुओं का बाहुबल लुप्त हो गया है। किन्तु उससे पहले कभी नहीं हुआ। हिन्दुओं का बाहुबल ही मेरा प्रतिपाद्य विषय है।
उनके चिंतन तथा दिग्दर्शन का मुख्य विषय 18वीं शताब्दी का बंग समाज तथा उसकी विविध समस्याएं रहा है। उन्होंने अपने उपन्यासों द्वारा बंगाल में सामाजिक चेतना जगाने का प्रयत्न किया। उन्होंने अपने विभिन्न पात्रों के माध्यम से बंगाल में प्रचलित विधवा विवाह निषेध, बालविवाह की कुप्रथा, बहु विवाह, जातिच्युत होने का भय आदि का वर्णन किया।
“आनन्दमठ” उनका विश्व विख्यात उपन्यास 1770 के अकाल तथा 1772 के “संन्यासी विद्रोह” पर आधारित देशभक्ति एवं राष्ट्रप्रेम की सर्वोत्तम कृति है। शीघ्र ही उनका ये उपन्यास क्रांतिवीर वासुदेव बलवंत फड़के के बाद से लेकर वर्तमान तक स्वबोध का मंत्र बन गया। सम्पूर्ण राष्ट्रीय आन्दोलन में आनन्दमठ में उघृत ‘वन्दे मातरम्’ आजादी का नाद, मूलमंत्र तथा प्रेरणा स्रोत बना रहा।
बंकिमचन्द्र इस बात को बार-बार स्पष्ट करते हैं कि मुस्लिम तथा युरोपीयन इतिहासकारों ने भारतीय अतीत का वर्णन झूठा तथा कोरी गप्पों से युक्त लिखा है। उदाहरणतः वे मैकाले का वर्णन करते हैं। उनका यह भी कथन है कि मुस्लिम तथा अंग्रेज़ इतिहासकारों ने जानबूझकर कर ओझल किया है।
उन्होंने अपने निबन्धों में भारतीयों के पड़ोसी देशों – लंका, जावा, बाली में विस्तार, मुसलमानों और अंग्रेज़ों से संघर्ष का वर्णन किया है। जहाँ वे स्थान-स्थान पर मुसलमानो के संघर्ष के विकृत वर्णन की आलोचना करते, वहाँ ‘चतुर क्लाइव’ के द्वारा प्लासी युद्ध के ब्रिटिश निष्कर्षों को स्वीकार नहीं करते।
उदाहरणतः वे लिखते हैं कि – “ऐसे इतिहास के अनुसार, कुछ गिने-चुने अंग्रेज़ों ने तथा तैलंग सैनिकों ने प्लासी युद्ध में हजारों देशी सैनिकों को पराजित कर दिया। ये झूठा कोरा उपन्यास है। प्लासी में कोई युद्ध हुआ ही नहीं। यह सब झूठ है।”
यहाँ तैलंग से मतलब क्लाइव द्वारा मद्रास से हिन्दू-मुसलमानों से है। वस्तुतः बंकिमचन्द्र की भांति अनेक इतिहासकार इसे केवल धोखे तथा कूटनीतिज्ञता से प्राप्त ब्रिटिश विजय मानते हैं, जो बिना लड़े ही जीत लिया गया।
यह निश्चित है कि बंकिमचन्द्र ने इतिहास विश्लेषण या इतिहास लेखन की कोई निश्चित दिशा नहीं दी और न ही उनका यह विचार था। परन्तु उन्होंने इतिहास के प्रति एक तड़पन अवश्य पैदा की और एक नई सोच पैदा की। उसके पुनर्लेखन तथा पुनर्विश्लेण के लिए भारत मानस को बाध्य किया। जहाँ उनके उपन्यासों ने सामाजिक चेतना जागृत की, वहीं उनके उपन्यासों तथा लेखों ने उन्हें एक राष्ट्रनिर्माता के रूप में खड़ा किया।
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