
*● 26 दिसंबर को साहिबजादे जोरावर सिंह एवं फतेह सिंह की शौर्य एवं शहादत की 319 वीं वर्षगाँठ को ‘वीर बाल दिवस’ के रूप में मनाया जा रहा है।*
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 9 जनवरी 2022 को सिखों के 10वें गुरु ‘गुरु गोबिंद सिंह’ के उन चारों बेटों को श्रद्धांजलि देने के लिए हर वर्ष 26 दिसंबर को ‘वीर बाल दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा की थी। पीएम ने गुरु गोबिंद सिंह के प्रकाश पर्व के अवसर पर ट्वीट किया था कि यह ‘साहिबजादों’ के साहस और न्याय स्थापना की उनकी कोशिश को उचित श्रद्धांजलि है। मोदी ने अपने ट्वीट में कहा, ‘वीर बाल दिवस उसी दिन मनाया जाएगा जब साहिबजादा जोरावर सिंह जी और साहिबजादा फतेह सिंह जी ने दीवार में जिंदा चुनवा दिए जाने के बाद शहीदी प्राप्त की थी। इन दो महान हस्तियों ने धर्म के महान सिद्धांतों से विचलित होने के बजाय मौत को चुना।’

बहरहाल बात वीर बाल दिवस की करते हैं। वो वर्ष 1704 का दिसंबर महीना था। मुगल सेना ने 20 दिसंबर को कड़कड़ाती ठंड में अचानक आनंदपुर साहिब किले पर धावा बोल दिया। गुरु गोबिंद सिंह उसे सबक सिखाना चाहते थे, लेकिन उनके दल में शामिल सिखों ने खतरे को भांपकर वहां से निकलने में ही भलाई समझी। गुरु गोबिंद सिंह भी जत्थे की बात मानकर पूरे परिवार के साथ आनंदपुर किला छोड़कर चल पड़े। सरसा नदी में पानी का बहाव बहुत तेज था। इस कारण नदी पार करते वक्त गुरु गोबिंद सिंह का परिवार बिछड़ गया।

गुरु गोबिंद के साथ दो बड़े साहिबजादों- बाबा अजित सिंह और बाबा जुझार सिंह के साथ चमकौर पहुंच गए। वहीं, उनकी माता गुजरी, दोनों छोटे पोतों- बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह के साथ रह गईं। उनके साथ गुरु साहिब का सेवक रहा गंगू भी था। वो माता गुजरी को उनके दोनों पोतों समेत अपने घर ले आया। कहा जाता है कि माता गुजरी के पास सोने के सिक्कों को देखकर गंगू लालच में आ गया और उसने इनाम पाने की चाहत में कोतवाल को माता गुजरी की सूचना दे दी।
माता गुजरी अपने दोनों छोटे पोतों के साथ गिरफ्तार हो गईं। उन्हें सरहिंद के नवाब वजीर खान के सामने पेश किया गया। वजीर ने बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह को इस्लाम स्वीकारने को कहा। दोनों ने धर्म बदलने से इनकार कर दिया तो नवाब ने 26 दिसंबर, 1704 को दोनों को जिंदा दीवार में चुनवा दिया। वहीं, माता गुजरी को सरहिंद के किले से धक्का देकर मार दिया।
*>> इस दिन का इतिहास <<*
26 दिसंबर वह दिन है जिस दिन साहिबजादा जोरावर सिंह जी और साहिबजादा फतेह सिंह जी (साहिबजादे की छोटी जोड़ी) ने 6 और 9 साल की उम्र में एक दीवार में जिंदा सील होने के बाद शहादत प्राप्त की थी। साहिबजादा अजीत सिंह जी और साहिबजादा जुझार सिंह जी (साहिबजादे की बड़ी जोड़ी) ने 21 दिसंबर, 1705 को 18 और 14 साल की छोटी उम्र में चमकते साहिब में दुश्मन से लड़ते हुए शहीद हो गए थे।
गुरु गोबिंद सिंह जी के परिवार की इस महान शहादत को आज भी इतिहास की सबसे बड़ी शहादत माना जाता है। अत्याचारी के आगे तनकर खड़े रहने और धर्म की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने की यह घटना मिसाल बन गई। श्रद्धावान आज भी हर वर्ष सिख नानकशाही कैलेंडर के अनुसार, 20 दिसंबर से लेकर 27 दिसंबर तक शहीदी सप्ताह मनाते हैं। इन दिनों गुरुद्वारों से लेकर घरों तक में बड़े स्तर पर कीर्तन-पाठ किया जाता है। इस दौरान बच्चों को गुरु साहिब के परिवार की शहादत के बारे में बताया जाता है। साथ ही कई श्रद्धावान सिख इस पूरे हफ्ते जमीन पर सोते हैं और माता गुजरी और साहिबजादों की शहादत को नमन करते हैं।
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