
*सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी*

रांची। चंपाई सोरेन ने नयी पार्टी बनाने के संकेत तो दिये हैं, लेकिन उसके बाद उनके कदम जहां थे, वहीं अटके पड़े हैं। ना तो फिलहाल उनका रांची आने का कोई प्लान है और ना ही किसी नेता से मिलने का फिलहाल कोई कार्यक्रम है। ऐसे में राजनीति में संभावना यही है कि चंपाई सोरेन के लिए झामुमो के रास्ते बंद हो गये हैं।

बीजेपी में वो जाना नहीं चाहते, लिहाजा नयी पार्टी का ही अंतिम विकल्प उनके सामने बचा है। इधर राजनीति के जानकार बताते हैं कि चंपाई सोरेन लगातार अपने करीबी नेताओं के संपर्क में है।
इधर अलग पार्टी बनाने के संकेत के बीच अब उनकी नयी पार्टी के नाम को लेकर भी अटकलें लगनी शुरू हो गयी है। चर्चा से एक संकेत यह सामने आया है कि नई पार्टी भी झारखंड नामधारी ही होगी। जानकार बताते हैं कि उनकी पार्टी का नाम जो भी हो, लेकिन उसमें झारखंड और मोर्चा जरूर वो शामिल करेंगे।
लिहाजा एक नाम झारखंड मुक्ति मोर्चा (चंपाई) हो। झारखंड स्वतंत्र मोर्चा और झारखंड लोकतांत्रिक मोर्चा जैसे नामों की चर्चा हो रही है। चंपाई की पार्टी पहले या बाद में एनडीए का हिस्सा बन जाएगी।
राजनीति के जानकार कहते हैं कि चंपाई को लौटने और नई पार्टी बनाने का भाजपा ने सुझाव दिया। पार्टी बना कर चंपाई विधानसभा की सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारेंगे। इससे जेएमएम के वोटों में बंटवारा हो जाएगा। इससे भाजपा को फायदा होगा।
चंपाई भाजपा की स्क्रिप्ट पर ही अमल कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर पोस्ट की योजना भी भाजपा की ही थी, जिसमें उन्होंने अपने अपमान का हवाला देकर तीन विकल्प सुझाए थे।
इनमें एक विकल्प के रूप में अलग पार्टी बनाना भी शामिल था। ऐसा इसलिए भी क्योंकि पार्टी चलाने के लिए जो फंड की आवश्यकता होती है, वो भाजपा जैसी बडी पार्टी के सहयोग के बिना संभव नहीं है। लिहाजा हो ना हो चंपाई सोरेन भाजपा के ही इशारों पर ऐसे बागी तेवर दिखा रहे हों, ताकि चुनाव तक कंफ्यूजन की स्थिति बनी रही और चुनाव में इसका नुकसान झामुमो को उठाना पड़े।
*क्यों चंपाई पर डोरे डाल रही है बीजेपी*
भाजपा की रणनीति चंपई सोरेन को साथ लेकर झामुमो के जनाधार में सेंधमारी करने की है। चंपई के प्रभाव क्षेत्र वाले कोल्हान के लिए यह महत्वपूर्ण इस मायने में भी है कि इस प्रमंडल की 14 विधानसभा सीटों पर 2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का खाता नहीं खुल पाया था।
चंपई सोरेन के आने से इस परिस्थिति में बदलाव की आस पार्टी को है। यही वजह है कि पद से हटाए जाने के साथ ही भाजपा के वैसे नेताओं ने भी इनके साथ एकजुटता दिखाई जो इनकी सरकार को हेमंत सोरेन-पार्ट दो करार दे रहे थे।
भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के अलावा विधानसभा चुनाव के मद्देनजर प्रभारी बनाए गए शिवराज सिंह चौहान और हिमंत बिस्वा सरमा की सहमति के बगैर रणनीति में ऐसा बदलाव संभव नहीं था।
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी साथ खड़े हुए। अलग-अलग अवधि में तीन बार राज्य के सीएम रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा ने भी चंपई सोरेन को लेकर पूरी तरह उत्साह दिखाया, तो इसकी वजह यही है कि चंपई सोरेन को साथ लेने से भाजपा की राज्य में सत्ता में वापसी की राह आसान दिख रही है।
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