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आज २५ सितंबर को पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती है

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ByAdmin Office

Sep 25, 2022

 

 

*पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितंबर, 1916 को मथुरा ज़िले के नगला चंद्रभान गांव में हुआ था।*

उनके पिता का नाम, भगवती प्रसाद उपाध्याय तथा माता का नाम, रामप्यारी था। उनके पिता, रेल्वे में एक सहायक स्टेशन मास्टर थे और उनकी माताजी, एक ग्रहिणी थी। मात्र 3 वर्ष की आयु में, उनके पिता का निधन हो गया था और जब वह 7 वर्ष के थे, तो उनकी माता का भी देहांत हो गया था।

पंडित दीनदयाल ने हाई स्कूल की शिक्षा, राजस्थान के सीकर जिले में प्राप्त की। वह एक मेधावी छात्र थे, जिसके कारण सीकर के तत्कालीन राजा ने उनको एक स्वर्ण पदक, पुस्तकों के लिए ₹250 और ₹10 की मासिक छात्रवृत्ति पुरस्कार में दी थी। उन्होंने अपनी इंटर की परीक्षा, पिलानी से उत्तीर्ण की, जहां उन्होंने एक और स्वर्ण पदक प्राप्त किया। उन्होंने बी.ए. की परीक्षा, कानपुर के सनातन धर्म कॉलेज से प्राप्त की।

*1937 में अपने मित्र बलवंत महाशब्दे के कहने पर, वह स्वयं सेवक संघ में सम्मिलित हो गए।*

1951 में जब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जन संघ की स्थापना की, तो दीनदयाल उपाध्याय जी को प्रथम महासचिव नियुक्त किया गया। उन्होंने यह पद, दिसंबर 1967 तक संभाला।

*वह संघ के कार्यों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते थे, उनकी मेहनत देखकर डॉ. श्यामा प्रसाद जी को उन पर गर्व होने लगा।*

इसके बाद, 1953 में डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के आकस्मिक निधन होने से, संघ की ज़िम्मेदारी दीनदयाल जी के कंधों पर आ गई। दिसंबर 1967 में कालीघाट में हो रहे संघ के 14वें वार्षिक अधिवेशन के दौरान, दीनदयाल जी को संघ का अध्यक्ष निर्वाचित किया गया।

*1940 के दशक में उन्होंने, लखनऊ से प्रकाशित होने वाली एक मासिक पत्रिका ‘राष्ट्रधर्म’ में कार्य किया।*

वहीं से उनका रुझान, पत्रकारिता की तरफ हुआ। उन्होंने एक साप्ताहिक समाचार पत्र ‘पांचजन्य’ और एक दैनिक समाचार पत्र ‘स्वदेश’ भी आरंभ किया। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक, डॉ के. बी. हेडगेवार की जीवनी का मराठी से हिंदी में अनुवाद किया। सम्राट चंद्रगुप्त, जगतगुरु शंकराचार्य, अखंड भारत क्यों है, राष्ट्र जीवन की समस्याएं, राष्ट्र चिंतन आदि उनकी प्रसिद्ध कृतियां हैं।

*उन्होंने अंत्योदय का नारा दिया। वह चाहते थे, कि लोग राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति को भलीभांति समझें।*

उनका मानना था, कि लोग देश की जड़ों से जुड़कर ही देश का विकास कर सकते हैं। दीनदयाल जी को, जनसंघ का आर्थिक नीति का रचनाकार कहा जाता है। उनका कहना था, कि भारत का आम नागरिक सुखी हो, तभी भारत का आर्थिक विकास होगा।

*उनका कहना था, कि भारतीय राष्ट्रवाद का आधार इसकी संस्कृति है।*

इस संस्कृति में निष्ठा रहे, तभी भारत एकात्मक रहेगा।” उन्होंने अपनी पुस्तक ‘एकात्म मानववाद’ में साम्यवाद और पूंजीवाद, दोनों ही विषयों पर अपने विचार प्रकट किए हैं। उनका मानना है, कि हिंदू कोई धर्म या संप्रदाय नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय संस्कृति है।

*अध्यक्ष बनने के मात्र 43 दिनों बाद, 11 फरवरी, 1968 की रात्रि में मुगलसराय स्टेशन पर, दीनदयाल उपाध्याय जी की हत्या कर दी गई।*

संघ से जुड़े लोग और कार्यकर्ता, अनाथ हो गए और पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। उन्होंने समाज और राष्ट्र के उत्थान के लिए, उत्कृष्ट कार्य किए और नए विचारों का स्वागत किया।

*उन्हें भाजपा का पितृ पुरुष भी कहा जाता है।*

*उम्मीद है, यह जानकारी आपको अच्छी लगेगी। ऐसी ही अन्य किस्से कहानियों और तथ्यों को जानने के लिए, जुड़े रहिए ग्रुप के साथ।*


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