
नई दिल्ली। आदमी का मतलब उपभोक्ता होता है और उपभोक्ता का मतलब ठगी का शिकार। देश का प्रत्येक आदमी कहीं न कहीं अक्सर ठगा जा रहा है। सरकार ने उनके अधिकारों के संरक्षण के लिए कानून भी बनाया है। उन्हें जगाने का निरंतर प्रयास किया जा रहा है।

फिर भी उपभोक्ता सोये हैं, जबकि मुनाफे के लिए छल के नए-नए तरीके आजमाए जा रहे हैं, क्योंकि दो तिहाई से ज्यादा आबादी अपने ही अधिकारों के प्रति सतर्क नहीं है। केंद्रीय उपभोक्ता मंत्रालय का दावा है कि उपभोक्ता विवाद निवारण आयोगों के पास जो मामले आते हैं, उनपर गंभीरता से अमल करते हुए समाधान दिया जाता है, मगर प्रश्न है कि ऐसे मामले आते कितने हैं?

*कितने उपभोक्ता हुए सतर्क?*
सरकार की ओर से हाल में ऐसा कोई सर्वे नहीं कराया गया है, जिससे पता चल सके कि कितने उपभोक्ताओं को सतर्क किया गया है। ”जागो ग्राहक जागो”” का कितना असर हो पाया है। उपभोक्ता अधिकारों पर काम करने वाली एनजीओ कट्स (सीयूटीएस) इंटरनेशनल ने केंद्र सरकार की मदद से 2011-12 में सर्वे कराया था, जिससे पता चला था कि मात्र 20 प्रतिशत उपभोक्ता ही अधिकारों के प्रति सचेत थे।
कट्स के एसोसिएट डायरेक्टर दीपक सक्सेना का कहना है कि 13 वर्ष बाद भी हालात बहुत नहीं बदले हैं। जागरूकता में पांच से दस प्रतिशत ही वृद्धि हो पाई है। स्पष्ट है कि तमाम प्रयासों के बावजूद अबतक अधिकतम 30 प्रतिशत उपभोक्ता ही जाग पाए हैं।
*ठगे जाने के बाद लोग सामने नहीं आते*
बाकी को पता नहीं कि किसी उत्पाद या सेवा की खरीदारी में उनके साथ प्रपंच होने पर वे क्या कर सकते हैं। आधे से ज्यादा लोग मन मसोसकर खुद को बाजार के हालात पर छोड़ देते हैं कि यह प्रणाली सुधरने वाली नहीं है। उपभोक्ता मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि ठगे जाने के बाद बहुत लोग सामने नहीं आते हैं।
इससे गलत उत्पाद बेचकर मुनाफा कमाने वालों को प्रोत्साहन मिलता है। 90 प्रतिशत लोगों ने तो कभी शिकायत ही नहीं की है। चार से पांच प्रतिशत उपभोक्ता ही कंपनी या उत्पाद निर्माता के पास अपनी शिकायत दर्ज कराते हैं। हालांकि हाल के वर्षों में आनलाइन खरीद और साइबर क्राइम में वृद्धि के चलते लोगों में अपने आप जागरूकता बढ़ रही है।
*”जागो ग्राहक जागो” अभियान के बारे में नहीं जानते लोग*
शहरी क्षेत्र के लोग कुछ ज्यादा जागरूक हुए हैं, जबकि गांवों के लोग अभी भी अनजान हैं। 90 प्रतिशत उपभोक्ताओं को ””जागो ग्राहक जागो”” अभियान के बारे में पता नहीं है। गांवों के लोग यह भी नहीं जानते कि खरीदारी से पहले आईएसआई, आईएसओ एवं एगमार्क जैसे गुणवत्ता प्रमाणन की छानबीन करनी चाहिए।
कई शिक्षित ग्रामीणों को भी नहीं पता कि खराब उत्पाद की शिकायत कहां करनी चाहिए। वे डीलर या दुकानदार के पास जाते हैं तो उन्हें निर्माता कंपनियों के पास जाने के लिए कहकर टरका दिया जाता है। कुछ जागरूक हैं भी तो उन्हें कंज्यूमर कोर्ट की लेटलतीफी ने उदासीन कर दिया है।इंटरनेशनल कंज्यूमर पालिसी एक्सपर्ट प्रो. बीजान मिश्रा का कहना है कि अगर किसी से प्रेरित होकर कोई व्यक्ति उचित फोरम में चला भी गया तो गारंटी नहीं कि उसे समाधान मिल ही जाए।
*18 से 20 प्रतिशत उपभोक्ताओं को ही मिलता संतोष*
शिकायत दर्ज कराने वाले केवल 18 से 20 प्रतिशत उपभोक्ताओं को ही संतोषजनक समाधान मिलता है। बाकी को या तो समाधान नहीं मिला या कार्रवाई से संतुष्टि नहीं मिली। हालांकि सुखद संकेत है कि कई मामलों में त्वरित समाधान मिलने से उपभोक्ता निवारण तंत्र पर भरोसा धीरे-धीरे बढ़ रहा है। ई-प्लेटफार्म पर भरोसा नहीं होने पर भी खरीदारी बढ़ रही है। एक सर्वे में बात आई है कि शहरों में 56 प्रतिशत उपभोक्ता आनलाइन खरीद करने लगे हैं। हालांकि अलग बात है कि उन्हें आनलाइन खरीदे गए उत्पादों की गुणवत्ता पर भरोसा फिर भी नहीं होता।
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