
सरायकेला : चांडिल अनुमंडल क्षेत्र के दलमा वन्यजीव अभयारण्य की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। दलमा रेंज 192.22 वर्ग किलोमीटर में फैले इस सेंचुरी अब 188.02 स्क्वायर कम गया। ड्यू टू D forestion बदल गया । दलमा पूर्वी और पश्चिमी दोनों रेंज के रेंजर सेवानिवृत्त हो चुके हैं।
रेंजरों के रिटायरमेंट के बाद एक्सटेंशन पर दोनों रेंज की जिम्मेदारी चल रही है। वर्तमान में पूरा सेंचुरी डीएफओ के अधीन है, जहां महज 20 वनरक्षी और करीब 55 दैनिक भोगी मजदूरों के भरोसे जंगल की सुरक्षा व्यवस्था टिकी है।
*पर्यटकों में नाराजगी, होर्डिंग में ही दिख रहे वन्यजीव*
विभिन्न राज्यों से आने वाले पर्यटक और जंगल प्रेमी दलमा भ्रमण के दौरान वन्यजीव नहीं दिखने से नाराजगी जता रहे हैं। उनका कहना है कि सड़कों पर केवल वन्यजीवों की होर्डिंग लगी है, जबकि जंगल में सुरक्षा और संरक्षण के नाम पर कुछ नहीं है।
दलमा को गज परियोजना के नाम से जाना जाता है, लेकिन स्थिति यह है कि अधिकांश वन्यजीव पलायन कर चुके हैं। अब रेस्क्यू किए गए कुछ हिरण, सांभर और दो हाथी रजनी और बादल ही देखने को मिलते हैं। टूरिज्म को बढ़ावा देने के नाम पर सफारी गाड़ियों से पर्यटकों को केवल दलमा हिलटॉप और मंदिर घुमाकर वापस लाया जा रहा है, सेंचुरी के अंदर नहीं ले जाया जा रहा।
*सुप्रीम कोर्ट कमेटी ने अवैध निर्माण तोड़ने का दिया निर्देश*
इधर सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल इम्पावर्ड कमिटी (CEC) ने झारखंड सरकार को सख्त निर्देश दिया है कि दलमा वन्यजीव आश्रयणी के भीतर बने अवैध निर्माण को तोड़ा जाए। साथ ही दलमा इको-सेंसिटिव जोन में राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड से बिना NOC लिए बनाए गए टूरिज्म कॉटेज को भी ध्वस्त किया जाए और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।
*सीबीआई जांच की मांग*
स्थानीय ग्रामीण सत्यनारायण मुर्मू ने केंद्र सरकार से अपील की है कि दलमा में अब तक हुए फंडिंग और अवैध गतिविधियों की सीबीआई जांच कराई जाए। ग्रामीणों का आरोप है कि पर्यटन विभाग इको-सेंसिटिव जोन घोषित करने के बाद पर्यटकों को बढ़ावा तो दे रहा है, लेकिन वन्यजीवों के संरक्षण पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है।
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