
दिन – बुधवार
विक्रम संवत् – 2080
शक संवत् – 1945
अयन – दक्षिणायन
ऋतु – शरद

मास – भाद्रपद (गुजरात महाराष्ट्र में श्रावण)
पक्ष – कृष्ण
तिथि – सप्तमी दोपहर 03:37 तक तत्पश्चात अष्टमी

नक्षत्र – कृतिका सुबह 09:20 तक तत्पश्चात रोहिणी
योग – हर्षण रात्रि 10:26 तक तत्पश्चात वज्र
राहु काल – दोपहर 12:38 से 02:12 तक
सूर्योदय – 06:23
सूर्यास्त – 06:53
दिशा शूल – उत्तर दिशा में
ब्राह्ममुहूर्त – प्रातः 04:51 से 05:37 तक
निशिता मुहूर्त – रात्रि 12:15 से 01:01 तक
व्रत पर्व विवरण – शीतला सप्तमी, श्रीकॄष्ण जन्माष्टमी (स्मार्त), बुधवारी अष्टमी
विशेष – सप्तमी को ताड़ का फल खाया जाय तो वह रोग बढ़ानेवाला तथा शरीर का नाशक होता है । अष्टमी को नारियल का फल खाने से बुद्धि का नाश होता है । (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)
बुधवारी अष्टमी : 06 सितम्बर 2023
पुण्यकाल : 06 सितम्बर दोपहर 03:37 से 07 सितम्बर सूर्योदय तक ।
बुधवारी अष्टमी को किये गए जप, तप, मौन, दान व ध्यान 10 लाख गुना फलदायी होता है ।
मंत्र जप एवं शुभ संकल्प हेतु विशेष तिथि सोमवती अमावस्या, रविवारी सप्तमी, मंगलवारी चतुर्थी, बुधवारी अष्टमी – ये चार तिथियाँ सूर्यग्रहण के बराबर कही गयी हैं । इनमें किया गया जप-ध्यान, स्नान , दान व श्राद्ध अक्षय होता है ।
जन्माष्टमी (स्मार्त)- 06 सितम्बर 2023
जन्माष्टमी व्रत की महिमा
06 सितम्बर 2023 बुधवार को जन्माष्टमी (स्मार्त) 07 सितम्बर 2023 गुरुवार को जन्माष्टमी (भागवत)
भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिरजी को कहते हैं : “२० करोड़ एकादशी व्रतों के समान अकेला श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत हैं ।”
धर्मराज सावित्री से कहते हैं : “ भारतवर्ष में रहनेवाला जो प्राणी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत करता है वह १०० जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है ।”
जन्माष्टमी के दिन पापमुक्ति के लिए तिलमिश्रित जल से स्नान कर सको तो अच्छा है, गोबर लीपकर अपने शरीर को मलकर स्नान कर सको तो अच्छा है, गोझरण, गोमूत्र से रगड़ के स्नान कर सको तो स्फूर्तिदायी पापनाशक होगा ।
बालक, अति कमजोर तथा बूढ़े लोग अनुकूलता के अनुसार थोड़ा फल आदि खायें ।
जन्माष्टमी के दिन किया हुआ जप अनंत गुना फल देता है ।
उसमें भी जन्माष्टमी की पूरी रात जागरण करके जप-ध्यान का विशेष महत्त्व है। जिसको क्लीं कृष्णाय नमः मंत्र का और अपने गुरु मंत्र का थोड़ा जप करने को भी मिल जाय, उसके त्रिताप नष्ट होने में देर नहीं लगती ।
‘भविष्य पुराण’ के अनुसार जन्माष्टमी का व्रत संसार में सुख-शांति और प्राणीवर्ग को रोगरहित जीवन देनेवाला, अकाल मृत्यु को टालनेवाला, गर्भपात के कष्टों से बचानेवाला तथा दुर्भाग्य और कलह को दूर भगानेवाला होता है।
जन्माष्टमी व्रत पुण्य के साथ दिलाये स्वास्थ्य लाभ
जन्माष्टमी के दिनों में मिलने वाला पंजीरी का प्रसाद वायुनाशक होता है । उसमें अजवायन, जीरा व गुड़ पड़ता है । इस मौसम में वायु की प्रधानता है तो पंजीरी खाने खिलाने का उत्सव आ गया । यह मौसम मंदाग्नि का भी है । उपवास रखने से मंदाग्नि दूर होगी और शरीर में जो अनावश्यक द्रव्य पड़े हैं, उपवास करने से वे खिंचकर जठर में आ के स्वाहा हो जायेंगे, शारीरिक स्वास्थ्य मिलेगा । तो पंजीरी खाने से वायु का प्रभाव दूर होगा और व्रत रखने से चित्त में भगवदीय आनंद, भगवदीय प्रसन्नता उभरेगी तथा भगवान का ज्ञान देने वाले गुरु मिलेंगे तो ज्ञान में स्थिति भी होगी
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