
केंदुआ। विद्यां ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम् । पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम् ॥
अर्थात, विद्या विनय देती है, विनय से पात्रता आती है, पात्रता से धन आता है, धन से धर्म होता है, और धर्म से सुख प्राप्त होता है।

किन्तु इसके अर्थ को लेकर समाज के रचनाकार मानाजानेवाले शिक्षा जगत के गुरु यानी शिक्षक इसका अर्थ को सर्वप्रथम धन को प्राथमिकता देते हुए बड़ी ही सुगमता एवं सरलता पूर्वक शिक्षा के नाम पर व्यपार का माध्यम बनाया है,यह वाकया है केंदुआ करकेन्द के निजी विद्यालयों का जिसे समझने के लिए इनके पूरे तन्त्र व्यवस्था को समझने की आवश्यकता है। आज हम निजी विद्यालयों के इस व्यवस्था को समझाने की कोशिश करते है । सरकार द्वारा संचालित सरकारी विद्यालय में बच्चों की संख्या में कमी के कारण को कौन नहीं जानते हैं? जैसे- सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी , जिसका भरपूर फायदा निजी स्कूलों के संचालक उठाने से नहीं चूकते है । एक ओर सरकार शिक्षा को लेकर तरह-तरह के योजनाओं को पारित कर बच्चों को उचित शिक्षा के लिए स्कूल तक लाने का प्रयास करती है – बच्चों के लिए , मध्यान भोजन, ड्रेस, किताबें, साइकिल, छात्रवृत्ति जैसे कई तरह से मदद करते हैं। किन्तु अभिभावकों द्वारा यह मानना है कि सिर्फ इन योजनाओं से बच्चों का भविष्य बेहतर बनाने में सहायक नहीं हो सकता, अपितु निजी स्कूलों में बेहतर शिक्षा मिलती है। अब यहाँ से शुरू होता है निजी स्कूलों का व्यापार का खेल- इनको पता है कि सरकारी स्कूलों की कमियों को ताक पर रखकर अपनी दुकान को चलाने में क्या हर्ज है? इन स्कूलों में कक्षा नर्सरी से दसवीं तक पढ़ाई होती है । एनसीईआरटी, सीबीएसई, आईसीएसई माध्यम द्वारा मान्यता प्राप्त कहकर बच्चों की भर्ती प्रक्रिया शुरू की जाती है, किन्तु जैसे ही बच्चे 7वीं की परीक्षा उत्तीर्ण कर लेते हैं, उन्हें 8वीं में किसी मान्यता प्राप्त विद्यालय में झारखंड अधिविध परिषद (JAC) में परिवर्तन कर निजी विद्यालय द्वारा मान्यता प्राप्त विद्यालय में भर्ती करा दिया जाता है, बच्चा पढ़ता है अपने निजी विद्यालय में , अपनी हर महीनें की फीस भी देता है, किन्तु किसी प्रकार की आंतरिक परीक्षा देने उसी मान्यता प्राप्त विद्यालय में जाना पड़ता है। बच्चा एक किन्तु उक्त बच्चे का नाम और उपस्थिति दोनों विद्यालयों में दर्ज रहता है , कैसे ? इंग्लिश मीडियम में भर्ती कर (जैक) हिंदी मीडियम की परीक्षा दिलाने व दसवीं पास करने के उपरांत झारखंड बोर्ड का सर्टिफिकेट और अपने विद्यालय की नहीं दूसरे विद्यालय का स्थानांतरण पत्र (SLC) School Leaving Certificate देना, कैसे और क्यों ? प्रत्येक वर्ष जब बच्चा अपने कक्षा में उत्तीर्ण होने पर शेषन चार्ज( Session Charge ) के नाम पर मोटी रकम लेना, जबकि वह पूरे वर्ष अपनी पढ़ाई की मोटी फीस जो निर्धारित की गई होती है देने के पश्चात भी अपने अगली कक्षा में जाने के लिए पनः मोटी रकम की फीस देना पड़ता है, क्यों ? बात यहीं खत्म नहीं होती, किताबों का बोझ इन मासूमों के कंधों पर इतना अधिक होता है कि पूछिये मत, कक्षा नर्सरी, केजी से लेकर 1-5 तक के बच्चों के किताबों का खर्च तकरीबन ₹2500 से ₹5000 तक का होना तय है, उसपर भी कुछ किताबें हर साल बदल दिया जाता है, क्यों? पुस्तक की दुकान एक निर्धारित दुकान पर हीं मिलती है, क्यों? दरअसल निर्धारित पुस्तक दुकानों से सभी कक्षाओं के पुस्तकों की संख्याओं एवं मूल्य की गणना करने के उपरांत दुकान मालिक से अग्रिम रकम जो कि पुस्तकों की बिक्री पर कमीशन मिले उसे ले लेते है और साथ ही इस बात का खास ध्यान रखते है की प्रत्येक पुस्तक की कीमत ₹100 से अधिक अंकित की हुई हो । निजी स्कूलों में किसी दो दिन अलग रंग की ड्रेस का भी चलन है, जो कि विद्यालय द्वारा बेचा जाता है, जिसमें, बेल्ट, टाई और आईडी भी शामिल हैं, जबकि इसे किसी भी दुकान से लिया जा सकता है, फिर क्यों? बताते चलें कि, शहर से लेकर गाँव, गली-कस्बों में न जाने कितने ही निजी स्कूलों का संचालन किया जाता है, जिसे सरकार ने साक्षरता मिशन द्वारा प्रत्येक वर्ष UDISE पोर्टल के माध्यम से समय-समय पर ऑनलाइन एवं ऑफलाइन दोनों रूपों में पूरे विद्यालय में कमरों की संख्या, शिक्षकों, विद्यार्थियों, खेलने के उपकरण व मैदान, शौचालयों की संख्या, पीने का पानी का भंडारण, हाथ धोने के लिए साबुन या हैंडवाश, बेसिन, शिक्षकों का विवरण जैसे प्रशिक्षित शिक्षक, उनकी मानदेय, जैसे सभी छोटे-बड़े बातों को एक फॉर्म में भर कर जो कि ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों रूपों में अपने जिले के BRC (Block Resource Centre) होता है, वहां जमा करना पड़ता है। यहां तक तो ठीक है कि सरकार को इन विद्यालयों द्वारा भेजा गया प्रारूप से सबकुछ ठीक है, किन्तु इन निजी स्कूलों द्वारा भेजा गया रिपोर्ट कहाँ तक सही है इसकी जाँच करने वाले अधिकारियों को भी बहाल की गई है, फिर भी सही तथ्य की जाँच नही हो पा रही है।जिससे निजी विद्यालय में छात्र छात्राओं के साथ अभिभावकों का बेख़ौफ़ हो रहा है चौतरफा शोषण जिसकी सुधि लेने वाला कोई नही

There is no ads to display, Please add some







Post Disclaimer
स्पष्टीकरण : यह अंतर्कथा पोर्टल की ऑटोमेटेड न्यूज़ फीड है और इसे अंतर्कथा डॉट कॉम की टीम ने सम्पादित नहीं किया है
Disclaimer :- This is an automated news feed of Antarkatha News Portal. It has not been edited by the Team of Antarkatha.com
