
धनबाद : तत्कालीन बिहार की आर्थिक राजधानी धनबाद कोयलांचल एक ऐसा क्षेत्र रहा जहां एक लोटा और गमछा लेकर आने वाले भी अरबपति बन गए।कोयला की काली कमाई,रंगदारी और माफियागिरी ने ऐसा रंग जमाया कि देखते हीं देखते इस कोयलांचल के इस धरती पर कई लोग रातों रात एक ऐसा चेहरा बन गए जिनके पास पैसों की बारिश होने लगी।
एक कलंकित अध्याय भी रहा रक्त रंजित इतिहास भी रहा और पैसों की चाहत और बर्चस्व की लड़ाई में अपने हीं अपनो के खून के प्यासे हो गए।कई लाशें गिरी, कितनो मां की कोख और सुहागिनों के मांग के सिंदूर धुले।

कुछ तो राजनीति में आकर अपने रसूख और कद को इतना बढ़ा लिया कि इनके यहां अधिकारी णोकरशाह

धनबाद लोकसभा से एक सांसद जो बस
वह जमाना आपातकाल का था. साल 1977 का था. मार्क्सवादी चिंतक ए के राय को धनबाद जेल में डाल दिया गया था. ए के राय ने धनबाद जेल से ही नामांकन किया और बिना किसी बैनर, पोस्टर के ही चुनाव जीत भी गए. जेल तो उसे समय शिबू सोरेन और विनोद बाबू भी गए थे. लेकिन यह लोग जेल से बाहर आ गए और ए के राय जेल में ही रह गए. लोगों के दबाव पर उन्होंने धनबाद लोकसभा से पहली बार नामांकन किया. उस समय नारा चल रहा था, जेल का ताला टूटेगा, ए के राय छूटेगा. चुनाव का परिणाम जब आया तो वह सांसद चुन लिए गए थे. वह भी एक चुनाव का समय था और आज भी एक चुनाव का समय है. न जाने कितने बदलाव हुए, इसकी गिनती मुश्किल है.
तीन बार सिंदरी से चुने गए विधायक
बता दें कि 1935 में जन्मे ए के राय केमिकल इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर सिंदरी के प्रोजेक्ट एंड डेवलपमेंट इंडिया लिमिटेड में बतौर अभियंता नौकरी ज्वाइन की. लेकिन यहां उनका मन मजदूरों की परेशानी को लेकर विचलित रहने लगा. फिर मजदूरों की एक सभा में वह पहुंचे. मजदूर प्रबंधन के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे. मैनेजमेंट को जब यह मालूम हुआ तो ए के राय के सामने दो शर्त रख दी. या तो मजदूरों के साथ रहे या नौकरी करें. उन्होंने मजदूरों के साथ रहना बेहतर समझा और त्यागपत्र दे दिया. उसके बाद वह सिंदरी विधानसभा क्षेत्र से तीन बार विधायक चुने गए. 1967, 1969 और 1972 में वे सिंदरी से विधायक रहे. उसके बाद पहली बार 1977 में धनबाद के सांसद चुने गए. फिर आगे दो बार धनबाद के लोगों ने उन्हें अपना सांसद चुना.
संत की तरह बिताया अपना जीवन
राजनीति में रहते हुए भी ए के राय संत की तरह जीवन बिताया. आजीवन अविवाहित रहे. मजदूरों के लिए लड़ते रहे, माफिया से संघर्ष करते रहे. देश के वह पहले ऐसे सांसद हुए, जिन्होंने सांसद के पेंशन का विरोध किया और आजीवन पेंशन ग्रहण नहीं किया. हिंदी, अंग्रेजी और बंगला में उनकी जबर्दस्त पकड़ थी. उनके आलेख देश के प्रतिष्ठित अखबारों में प्रकाशित होते थे और वहां से मिले रैम्यूनरेशन से ही उन्होंने अपना जीवन बिताया. जब वह बीमार रहने लगे तो परिवार वालों के पास जाने के बजाय वह सुदाम डीह में मासस के कार्यकर्ता के घर रहना पसंद किया. धनबाद के सेंट्रल हॉस्पिटल में कई दिनों तक भर्ती रहने के बाद उनका निधन हो गया. उनके निधन से धनबाद की राजनीति में जो रिक्तता पैदा हुई ,वह आगे भी भरना संभव नहीं होगा .धनबाद में माफिया उन्मूलन अभियान में भी उनकी बड़ी भूमिका थी.
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