
गर्मी के इस चिलचिलाती धूप से हर कोई परेशान हैं।चाहे व्यावसाई हो या मजदूर।लेकिन करें भी तो क्या करें?आखिर अपना काम तो करना ही पड़ेगा।ठीक इसी तरह इन दिनों स्कूली बच्चों को इस चिलचिलाती धूप का सामना करना पड़ रहा है।
व्यावसायी या मजदूरों से इन छोटे-छोटे 6 साल से 18 साल के स्कूली बच्चों का तुलना क्यों कर रहा हूं?मैं तुलना तो नहीं कर रहा हूं, लेकिन जिस तरह से झारखंड में स्कूली बच्चों का विभाग द्वारा सुबह 7 बजे से दोपहर 2 बजे तक समय निर्धारित किया गया है उसमें से छुट्टी का समय ठीक नहीं है।

आखिर स्कूल को मॉर्निंग क्यों किया गया है?स्कूली बच्चों को गर्मी से राहत देने के लिए या चिलचिलाती धूप में परेशान करने के लिए? क्योंकि धूप का ज्यादा तेज होना देखा जाए तो लगभग 12 पूर्वाह्न बजे से दोपहर दो-ढाई बजे तक रहता है।ऐसे में कहीं न कहीं स्कूल का मॉर्निंग होना नाम मात्र ही मॉर्निंग कहने से इंकार नहीं किया जा सकता है।ऐसे गांव के बच्चे भी हैं जिस गांव के स्कूल को मर्ज कर दिया गया है उस गांव के छोटे-छोटे 6 से 11 साल के बच्चों के विषय में सोचिए जो लगभग 1-2 किलोमीटर दूर पैदल चिलचिलाती धूप से घर लौटते हैं।जरा सोचिए जिस गांव में मिडिल स्कूल,हाई स्कूल या प्लस टू विद्यालय नहीं है उस गांव के छात्रों लगभग 2 किलोमीटर से लगभग 5-7 किलोमीटर दूरी तय कर जाते हैं।वैसे छात्रों के विषय में सोचिए कि इस चिलचिलाती धूप में कितने परेशानी का सामना करते है। ऐसे में कहीं-न-कहीं इन तमाम तथ्यों को देखने पर यहीं लगता है कि स्कूल के मॉर्निंग समय को विभाग को संशोधन कर 12 पूर्वाह्न बजे से पहले छुट्टी का समय निर्धारित करना चाहिए,कहने से इंकार नहीं किया जा सकता है।

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