
हमारे देश में भक्ति एवं उपासना का एक रूप उपवास है । जो मनुष्य में सैयम, त्याग, प्रेम एवम श्रध्दा की भावना को बढ़ाते हैं, उन्ही में से एक हैं- जीवित्पुत्रिका व्रत । यह व्रत संतान की मंगल कामना के लिए किया जाता हैं। यह व्रत मातायें रखती हैं।
जीवित्पुत्रिका व्रत निर्जला किया जाता हैं। जिसमे पूरा दिन एवम रात पानी नही लिया जाता। इसे तीन दिन तक मनाया जाता हैं। संतान की सुरक्षा के लिए इस व्रत को सबसे अधिक महत्व दिया जाता हैं। पौराणिक समय से इसकी प्रथा चली आ रही है ।

हिन्दू पंचाग के अनुसार यह व्रत आश्विन माह कृष्ण पक्ष की सप्तमी से नवमी तक मनाया जाता हैं। इस निर्जला व्रत को विवाहित मातायें अपनी संतान की सुरक्षा के लिए करती हैं।

इस वर्ष 2022 में यह व्रत 18 सितंबर, दिन रविवार को मनाया जायेगा।
अश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 17 सितंबर 2022 को दोपहर 2.14 मिनट से शुरू होगी। अष्टमी तिथि का समापन 18 सितंबर 2022 को शाम 04.32 मिनट तक रहती है. उदयातिथि के अनुसार जीवित्पुत्रिका व्रत 18 सितंबर 2022 को रखा जाएगा. इस व्रत का पारण 19 सितंबर 2022 को 06.38 मिनट के बाद किया जाएगा।
जीवित्पुत्रिका व्रत पूजा विधि—
यह व्रत तीन दिन किया जाता है, तीनो दिन व्रत की विधि अलग-अलग होती हैं।
नहाई खाई– यह दिन जीवित्पुत्रिका व्रत का पहला दिन कहलाता है, इस दिन से व्रत शुरू होता हैं। इस दिन महिलायें नहाने के बाद एक बार भोजन लेती हैं. फिर दिन भर कुछ नहीं खाती।
खर- जितिया– यह जीवित्पुत्रिका व्रत का दूसरा दिन होता हैं। इस दिन महिलायें निर्जला व्रत करती हैं। यह दिन विशेष होता हैं.।
पारण- यह जीवित्पुत्रिका व्रत का अंतिम दिन होता हैं। इस दिन कई लोग बहुत सी चीज़े खाते हैं, लेकिन खासतौर पर इस दिन झोर भात, नोनी का साग एवम मडुआ की रोटी दिन के पहले भोजन में ली जाती हैं।
इस प्रकार जीवित्पुत्रिका व्रत का यह तीन दिवसीय उपवास किया जाता हैं।
जीवित्पुत्रिका व्रत महत्व…
कहा जाता हैं कि, एक बार एक जंगल में चील और लोमड़ी घूम रहे थे, तभी उन्होंने मनुष्य जाति को इस व्रत को विधि पूर्वक करते देखा एवम कथा सुनी। उस समय चील ने इस व्रत को बहुत ही श्रद्धा के साथ ध्यानपूर्वक देखा, वही लोमड़ी का ध्यान इस ओर बहुत कम था। चील के संतानों एवम उनकी संतानों को कभी कोई हानि नहीं पहुँची । लेकिन लोमड़ी की संतान जीवित नहीं बची। इस प्रकार इस व्रत का महत्व बहुत अधिक बताया जाता हैं।
जीवित्पुत्रिका व्रत कथा —
यह कथा महाभारत काल से जुड़ी हुई हैं। महाभारत युद्ध के बाद अपने पिता की मृत्यु के बाद अश्वथामा बहुत ही नाराज था और उसके अन्दर बदले की आग तीव्र थी, जिस कारण उसने पांडवो के शिविर में घुस कर सोते हुए पांच लोगो को पांडव समझकर मार डाला था, लेकिन वे सभी द्रोपदी की पांच संताने थी। उसके इस अपराध के कारण उसे अर्जुन ने बंदी बना लिया और उसकी दिव्य मणि छीन ली, जिसके फलस्वरूप अश्वथामा ने उत्तरा की अजन्मी संतान को गर्भ में मारने के लिए ब्रह्मास्त्र का उपयोग किया, जिसे निष्फल करना नामुमकिन था।
उत्तरा की संतान का जन्म लेना आवश्यक थी, जिस कारण भगवान श्री कृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल उत्तरा की अजन्मी संतान को देकर उसको गर्भ में ही पुनः जीवित किया। गर्भ में मरकर जीवित होने के कारण उसका नाम जीवित्पुत्रिका पड़ा और आगे जाकर यही राजा परीक्षित बना। तब ही से इस व्रत को किया जाता हैं। इस प्रकार इस जीवित्पुत्रिका व्रत का महत्व महाभारत काल से हैं।
इस व्रत के संबंध में भगवान शंकर ने माता पार्वती को बताया था कि, यह व्रत संतान की सुरक्षा के लिए किया जाता है। इस व्रत से जुड़ी एक पौराणिक कथा है, जो जीमूतवाहन से जुड़ी है। सत्य युग में गंधर्वों के एक राजकुमार थे, जिनका नाम जीमूतवाहन था। वे सद् आचरण, सत्यवादी, बडे उदार और परोपकारी थे। जीमूतवाहन को राजसिंहासन पर बिठाकर उनके पिता वन में वानप्रस्थी का जीवन बिताने चले गए। जीमूतवाहन का राज-पाट में मन नहीं लगता था। वे राज-पाट की जिम्मेदारी अपने भाइयों को सौंप पिता की सेवा करने के उद्देश्य से वन में चल दिए। वन में ही उनका विवाह मलयवती नाम की कन्या के साथ हो गया।
वन में भ्रमण करते हुए जब एक दिन वे काफी आगे चले गए, तो एक वृद्धा को रोते हुए देखा। उनका हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने वृद्धा से उसके रोने का कारण पूछा तो उसने बताया- मैं नागवंश की स्त्री हूं। मुझे एक ही पुत्र है। नागों ने पक्षीराज गरुड़ को भोजन केे लिए प्रतिदिन एक नाग देने की प्रतिज्ञा की है। आज मेरे पुत्र शंखचूड़ की बलि का दिन है। जीमूतवाहन ने वृद्धा को आश्वस्त करते हुए कहा- डरो मत, मैं तुम्हारे पुत्र के प्राणों की रक्षा करूंगा। आज तुम्हारे पुत्र की जगह स्वयं को लाल कपडों से ढक कर शिला पर लेटूंगा। जीमूतवाहन ने शंखचूड़ के हाथ से लाल कपड़ा ले लिया और उसे लपेट कर निश्चित शिला पर लेट गए।
गरूड़ जी आए और लाल कपड़े में लिपटे जीमूतवाहन को पंजे से पकड़ कर पहाड़ के शिखर पर जा बैठे। इस बीच अपनी पकड़ में आए प्राणी की आंखों में आंसू देख कर गरुड़ जी आश्चर्य में पड़ गए। उससे परिचय पूछा, तो जीमूतवाहन ने सारी कथा सुना दी। गरुड़ जी उनकी बहादुरी और दूसरों की प्राण रक्षा के लिए खुद को बलिदान करने की भावना से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने जीमूतवाहन को जीवनदान दे दिया और नागों की बलि ना लेने का वचन भी दिया। जीमूतवाहन के त्याग और साहस से नाग जाति की रक्षा हुई। तभी से संतान की सुरक्षा और सुख के लिए जीमूतवाहन की पूजा की शुरुआत हो गई। यह व्रत कठिन तो है, पर बहुत फलदायी भी है। इस व्रत को जिउतिया के नाम से भी जाना जाता है।
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