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सरायकेला-खरसावां : चांडिल डैम बोटिंग परिसर में हर्षोल्लास से मना बुढ़ी करम पर्व, आदिवासी संस्कृति की झलक से सराबोर हुआ नौका विहार

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Oct 18, 2026
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सरायकेला-खरसावां जिले के चांडिल बांध विस्थापित मत्स्यजीवी स्वावलंबी सहकारी समिति द्वारा प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी चांडिल डैम के नौका विहार बोटिंग परिसर में बुढ़ी करम पर्व बड़े ही हर्षोल्लास और पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया गया।

 

इस अवसर पर समिति के अध्यक्ष नारायण गोप, सचिव श्यामल मार्डी सहित समिति के सैकड़ों सदस्य, ग्रामीण एवं दूर-दराज से आए पर्यटक उपस्थित रहे। पूरे परिसर में मांदल-धमसा की थाप और करम गीतों की गूंज सुनाई दी। पारंपरिक वेशभूषा में सजे महिला-पुरुषों ने करम नृत्य कर पर्व का आनंद लिया।

 

*बुढ़ी करम का क्या है महत्व -*

समिति के सचिव एवं मांझी परगना महाल के महासचिव श्यामल मार्डी ने बुढ़ी करम के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा, “आज बुढ़ी करम है। करमा पूजा से शुरू होने वाले इस पर्व का समापन जिहुड़ डाक के साथ होता है। आज के दिन हम खलिहान में नए धान लाकर पूजा-अर्चना करते हैं। मान्यता है कि आज से करमा का नृत्य बंद हो जाता है। इसके बाद दीपावली और सोहराय पर्व आएगा, तब सोहराय नाच होगा।”

 

*विलुप्त हो रही संस्कृति को बचाने का प्रयास -*

श्यामल माझी ने कहा कि संथाल समाज की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। दशई नाच, सोहराय नाच जैसे कई पारंपरिक नृत्य अब कम ही देखने को मिलते हैं। उन्होंने कहा, “हमारी कोशिश है कि हमारी पुरानी पारंपरिक व्यवस्था, नाच-गान को फिर से जीवित किया जाए। हम लोगों को जागृत कर रहे हैं, नई पीढ़ी को सिखा रहे हैं ताकि आदिवासी समाज के रीति-रिवाज और परंपराएं लुप्त न हों और अनवरत चलती रहें।”

 

उन्होंने बताया कि करमा नाच केवल नृत्य नहीं, बल्कि देवी-देवताओं की आराधना है। इसमें दोनों तरफ प्रणाम कर नृत्य किया जाता है, जो इसकी पवित्रता को दर्शाता है। कई लोग किताबों में ही करमा नाच के बारे में पढ़ते हैं, आज यहां प्रत्यक्ष देख रहे हैं।

 

*पर्यटक भी हुए शामिल -*

खास बात यह रही कि चांडिल डैम घूमने आए पर्यटकों ने भी इस उत्सव में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। बोटिंग करने आए पर्यटक करम दल के साथ थिरकते नजर आए। इससे चांडिल डैम का पर्यटन स्थल के साथ-साथ सांस्कृतिक संगम के रूप में भी महत्व बढ़ा है।

 

इस अवसर पर पूरे दिन सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हुआ और सैकड़ों महिला-पुरुषों ने पारंपरिक गीत-संगीत का लुत्फ उठाया।


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