
दशहरा के अवसर पर होने वाला रावण दहन आज एक बड़े आयोजन का रूप ले चुका है. इस परंपरा की शुरुआत वर्ष 1948 में हुई थी. उस समय रांची कॉलेज के पास महात्मा गांधी मार्ग स्थित डाकघर के सामने परिसर में 12 फीट के रावण का पुतला बनाया गया था. धीरे-धीरे यह आयोजन लोगों के बीच लोकप्रिय होता गया और आज मोरहाबादी मैदान में बड़ी संख्या में लोग रावण दहन देखने पहुंचते हैं.
वर्ष 1950 से 1955 के बीच रावण के पुतलों का निर्माण रेलवे स्टेशन के पास खजुरिया तालाब स्थित शरणार्थी शिविर में होने लगा था. इस दौरान रावण दहन बारी पार्क, यानी वर्तमान टाउन हॉल के पास किया जाता था. बाद में पंजाबी हिंदू बिरादरी के सदस्यों ने डोरंडा स्थित राम मंदिर में पुतलों का निर्माण शुरू कराया. आयोजन में लोगों की बढ़ती भीड़ को देखते हुए वर्ष 1960 से मोरहाबादी मैदान को रावण दहन के लिए चुना गया. इसके बाद पुतलों की ऊंचाई बढ़ने के साथ आयोजन का स्वरूप भी भव्य होता गया.

इस वर्ष मोरहाबादी मैदान में रावण दहन के लिए 70 फीट ऊंचा रावण, 65 फीट का कुंभकर्ण और 60 फीट का मेघनाथ बनाया जाएगा. इसके साथ 30×30 फीट की दो मंजिला सोने की लंका भी तैयार की जाएगी. पंजाबी हिंदू बिरादरी की ओर से हर साल इस आयोजन को और भव्य बनाने के साथ विभिन्न समुदायों को जोड़ने का प्रयास किया जाता है.

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