
रिपोर्ट सत्येन्द्र यादव
कुल्टी बराकर नदी तट पर शनिवार को काफी संख्या में लोगों ने अपने पितरों का तर्पण किया । इस संबंध में बताया जाता है कि धर्म ग्रंथों के अनुसार श्राद्ध के सोलह दिनों में लोग अपने पितरों को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर श्राद्ध करते हैं ।

ऐसी मान्यता है कि पितरों का ऋण श्राद्ध द्वारा चुकाया जाता है । वर्ष के किसी भी मास तथा तिथि में स्वर्गवासी हुए पितरों के लिए पितृपक्ष की उसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है । वही कई लोग अंतिम तिथि को श्राद्ध कर्म करते है । इस दौरान काफी संख्या में लोग शनिवार को प्रातः काल बराकर नदी तट पर पहुंचकर उपस्थित ब्राह्मणों द्वारा विधिवत मंत्रोचार के साथ अपने दिवंगत पूर्वजों के नाम से तर्पण किया । अंतिम दिन अमावस्या को काफी संख्या में लोगों ने बराकर नदी में पहुंचकर तर्पण किया । मान्यताओं के अनुसार पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितृगण वर्षभर तक प्रसन्न रहते हैं । धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि पितरों का पिण्ड दान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु, सुख-साधन तथा धन-धान्य आदि की प्राप्ति करता है । श्राद्ध में ये चीजें होना महत्वपूर्ण हैं- गंगाजल, दूध, शहद, दौहित्र, कुश और तिल केले के पत्ते पर श्राद्ध भोजन निषेध है । सोने, चांदी, कांसे, तांबे के पात्र उत्तम हैं । इनके अभाव में पत्तल उपयोग की जा सकती है । इसमें दूध, तिल, कुशा, पुष्प, गंध मिश्रित जल पितरों को तृप्त करने हेतु दिया जाता है । श्राद्ध पक्ष में इसे नित्य करने का विधान है । वही लोग अपने दाढ़ी तथा सर के कैश का मुंडन करवाकर ब्राह्मणों को दान पुण्य कर उन्हे भोजन भी करवाते है ।

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