
सरायकेला:- सरायकेला जिला मुख्यालय सहित महालिमोरूप, सीनी, राजनगर और इसके आसपास के ग्रामीण व शहरी इलाकों में शनिवार शाम को जियुतिया पर्व पारंपरिक श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया।
इस पवित्र अवसर पर माताओं ने अपनी संतान की सुख-समृद्धि, दीर्घायु और मंगल कामना के लिए तीन दिवसीय कठिन व्रत रखा और पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना की।
संतान की भलाई के लिए तीन दिनों का कठिन अनुष्ठान
हिंदू धर्म में जियुतिया (जीवितपुत्रिका) व्रत संतान की भलाई और उसकी लंबी उम्र के लिए रखा जाने वाला एक प्रमुख पारंपरिक व्रत माना जाता है।
यह व्रत हर साल आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि से शुरू होकर नवमी तिथि तक कुल तीन दिनों तक चलता है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, जो माताएं इस व्रत को पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ पूरा करती हैं, उनकी संतान को जीवन में किसी प्रकार का कष्ट नहीं उठाना पड़ता और परिवार में हमेशा सुख-शांति बनी रहती है।
सप्तमी से नवमी तक के नियम व पूजा विधि:
• सप्तमी (पहला दिन): व्रत की शुरुआत सप्तमी तिथि को होती है, जब माताएं स्नान आदि से निवृत्त होकर भोजन और जल ग्रहण (नहाय-खाय) करती हैं।
• अष्टमी (दूसरा दिन): अष्टमी तिथि को माताएं पूरे दिन निर्जला व्रत रखती हैं। इस दिन न तो अन्न का एक भी दाना ग्रहण नहीं किया जाता है और न ही जल पिया जाता है।
• नवमी (तीसरा दिन): नवमी तिथि को व्रत का पारण (समापन) किया जाता है और माताएं पुनः भोजन व जल ग्रहण करती हैं।
पूजा विधि के तहत सुबह स्नान करने के बाद सूर्य नारायण की प्रतिमा या चित्र को पवित्र स्नान कराया गया। इसके बाद विधि-विधान से उनकी पूजा-अर्चना की गई और फल, फूल, अक्षत तथा अन्य पूजन सामग्री से भोग लगाया गया।
शनिवार की शाम को सरायकेला जिला मुख्यालय और आसपास के क्षेत्रों में घर-घर में महिलाओं ने व्रत रखा। शाम के समय विभिन्न पूजा स्थलों पर महिलाओं की भारी भीड़ उमड़ी, जहां सभी ने एक साथ एकत्रित होकर सामूहिक पूजा की और अपनी संतान की लंबी उम्र के लिए सामूहिक प्रार्थना की।
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