
झरिया: कोयलांचल के कतरास मोड़ स्थित ऐतिहासिक राजागढ़ में स्थापित प्राचीन राधा-कृष्ण मंदिर आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। लगभग 200 वर्ष पुराना यह ऐतिहासिक मंदिर कभी झरिया राजघराने की आन-बान-शान और भक्ति का केंद्र हुआ करता था, लेकिन राजपाट खत्म होने के बाद अब यह उपेक्षा और खंडर रूपी स्थिति का शिकार हो चुका है।
इतिहास के झरोखों को टटोलें तो राजा दुर्गा प्रसाद सिंह ने अपनी पत्नी (राजमाता) के आग्रह पर इस भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था। शादी के बाद जब राजा साहब अपनी रानी को कतरास मोड़ स्थित गढ़ (राजागढ़) लेकर आए, तब इस पावन मंदिर की स्थापना हुई थी। एक दौर था जब जन्माष्टमी के मौके पर यहाँ असीम रोनक हुआ करती थी। राजा खुद भव्य बग्गी में सवार होकर मंदिर पहुँचते थे। चारों तरफ रंग-बिरंगी लाइटों की सजावट, ढोल-नगाड़ों की गूंज और पटाखों की आतिशबाजी के बीच ऐसा प्रतीत होता था मानो साक्षात भगवान श्रीकृष्ण का अवतरण हो रहा हो। पूरा क्षेत्र भक्ति और उल्लास के सतरंगी रंगों में डूब जाता था।

आज वही ऐतिहासिक परिसर वीराने में तब्दील हो चुका है। मंदिर की पुरानी इमारत धीरे-धीरे ढह रही है, चारों तरफ गंदगी का अंबार है और सफाई व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त है। इसके बावजूद, राज परंपरा का निर्वहन करते हुए झरिया राजघराने के पूर्व राजा काली प्रसाद सिंह के बड़े पुत्र महेश्वर प्रसाद सिंह आज भी अपने व्यक्तिगत प्रबंधन और देख-रेख से मंदिर में नियमित पूजा-पाठ का आयोजन करवा रहे हैं।

मंदिर में पिछले 40 वर्षों से अनवरत सेवा दे रहे वर्तमान पुजारी विश्वनाथ बनर्जी बताते हैं कि यह मंदिर कम से कम 150 से 200 साल पुराना है और उनसे पहले भी यहाँ तीन से चार पीढ़ियों के पुजारी सेवा दे चुके हैं। विश्वनाथ बनर्जी कहते हैं, “मंदिर की समस्त व्यवस्थाओं और अनुष्ठानों का खर्च हमारे मालिक महेश्वर प्रसाद सिंह ही उठाते हैं। हमें जब भी कोई समस्या होती है, हम उन्हीं के समक्ष रखते हैं। हम सार्वजनिक तौर पर किसी से कुछ नहीं मांगते, राजा साहब ही सब संभालते हैं।” उन्होंने बताया कि तमाम विषमताओं के बावजूद जन्माष्टमी पर रात 12 बजे पारंपरिक तरीके से विशेष जन्म पूजा का आयोजन होता है और दिन भर स्थानीय श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, जो अपनी आस्था प्रकट करने यहाँ आते हैं।
राजाओं के दिन ढलने और राजपाट समाप्त होने के बाद इस ऐतिहासिक धरोहर की जो स्थिति बनी है, वह अत्यंत चिंताजनक है। स्थानीय लोगों और प्रबुद्ध नागरिकों का मानना है कि मंदिर जैसी सार्वजनिक और सांस्कृतिक धरोहरों का संरक्षण केवल एक परिवार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। जिला प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और पर्यटन विभाग को इस ओर ध्यान देना चाहिए। यदि इस ऐतिहासिक इमारत का जीर्णोद्धार किया जाए, तो यह न केवल कोयलांचल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखेगा, बल्कि एक बेहतरीन पर्यटन स्थल के रूप में भी विकसित हो सकता है। फिलहाल, यह प्राचीन मंदिर अपनी बदहाली के बीच अपने गौरवशाली इतिहास की गाथा मूक बनकर गा रहा है।
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