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जमशेदपुर के युवा वकील का कमाल, हाईकोर्ट ने 12 साल पुराने केस में 3 गुना बढ़ाया मुआवजा

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Sep 2, 2026
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जमशेदपुर। झारखंड हाईकोर्ट ने एक पीड़ित परिवार को राहत देते हुए मृत भारी वाहन चालक जहांगीर खान के परिवार को मिलने वाले मुआवजे को 5.76 लाख से बढ़ाकर 18.30 लाख कर दिया है। इसके अतिरिक्त 6 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज भी देय होगा। मामले में जमशेदपुर निवासी युवा अधिवक्ता अनिकेत कुमार ओझा को मुख्य न्यायाधीश द्वारा एमिकस क्यूरी (न्यायालय का मित्र) नियुक्त किया गया था।

एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) एक लैटिन वाक्यांश है, जिसका शाब्दिक अर्थ “न्यायालय का मित्र” (Friend of the Court) होता है। यह कोई ऐसा व्यक्ति, वकील या संगठन होता है जो किसी चल रहे कानूनी मुकदमे का प्रत्यक्ष पक्षकार (वादी या प्रतिवादी) नहीं होता है। अदालत किसी जटिल, संवेदनशील या जनहित से जुड़े मामले में निष्पक्ष राय, कानूनी सलाह या विशेषज्ञता हासिल करने के लिए स्वयं एमिकस क्यूरी की नियुक्ति करती है , जिनका मुख्य काम अदालत को सही और निष्पक्ष निर्णय लेने में मदद करना होता है। इसी उद्देश्य से अधिवक्ता अनिकेत कुमार ओझा को उक्त मामले में एमिकस क्यूरी के रूप में नियुक्त किया गया था। वर्तमान में अधिवक्ता श्री ओझा रांची हाई कोर्ट में वकालत करते हैं ।

28 अगस्त 2026 को हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एम. एस. सोनक की अदालत ने वर्ष 2014 से लंबित अपील का निस्तारण किया। न्यायालय ने अधिवक्ता अनिकेत ओझा द्वारा मामले में दी गई योग्य कानूनी सहायता की विशेष सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने अपील कर्ताओं का पक्ष अत्यंत निपुणता से प्रस्तुत किया। अदालत ने मृतक की मासिक आय 4,500 के बजाय 10,000 निर्धारित की और उसमें 40 प्रतिशत फ्यूचर प्रॉस्पेक्ट्स जोड़ते हुए मुआवजा बढ़ाकर 18.30 लाख किया। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि भारी वाहन चलाना कुशल कार्य है । इसलिए National Insurance Company Ltd. को बढ़ी हुई मुआवजा राशि 6 प्रतिशत ब्याज सहित छह सप्ताह के भीतर जमा करने का निर्देश दिया गया है। ब्याज की गणना 7 जनवरी 2012 से वास्तविक भुगतान तक होगी, हालांकि अपील में हुई 388 दिनों की देरी की अवधि का ब्याज माफ किया गया है। अदालत ने झालसा, डालसा साहेबगंज और एमिकस क्यूरी को दावेदार परिवार से संपर्क कर राशि सीधे उनके बैंक खातों में पहुंचाने में सहायता करने का निर्देश भी दिया। अधिवक्ता ओझा ने कहा कि 12 वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे ग्रामीण परिवार का पक्ष उच्च न्यायालय में रखना उनके लिए सम्मान के साथ बड़ी नैतिक जिम्मेदारी भी थी।


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