
रक्षाबंधन की सुबह थी। मोहल्ले में त्योहार की रौनक थी।बाजार की दुकानें रंग-बिरंगी राखियों से सजी थीं और हर घर में तैयारियाँ चल रही थीं।
राहुल राजनीति विज्ञान का छात्र था। कॉलेज में वह लोकतंत्र, संविधान, समानता और नागरिक अधिकारों पर अक्सर चर्चा करता था। उस दिन उसकी बहन रिया राखी की थाली सजा रही थी। अचानक उसने राहुल से पूछा-“भैया, हर साल कहते हो कि भाई बहन की रक्षा करता है। लेकिन क्या सिर्फ भाई ही बहन की रक्षा करता है?”

राहुल मुस्कुराया, “नहीं, बहन भी तो भाई का साथ देती है।”

रिया ने फिर पूछा, “तो फिर समाज में लड़कियों को बराबरी देने के लिए सिर्फ राखी बाँधना ही काफी है? उन्हें बराबर शिक्षा, बराबर अवसर और अपनी जिंदगी के फैसले लेने की आजादी क्यों नहीं मिलनी चाहिए?”
राहुल के पास इस सवाल का कोई आसान जवाब नहीं था।
उसे कुछ दिन पहले की एक घटना याद आ गई। कॉलेज में छात्र राजनीति को लेकर जोरदार बहस कर रहे थे। कोई लोकतंत्र की बात कर रहा था, कोई संविधान की और कोई नागरिक अधिकारों की।तभी पास बैठी एक सफाईकर्मी की बेटी कॉलेज की फीस जमा करने के लिए मदद माँगने आई थी। सभी ने उसकी बात सुनी, लेकिन बहस खत्म होते ही सब अपने-अपने रास्ते चले गए।
उस दिन राहुल ने पहली बार महसूस किया था कि लोकतंत्र केवल संसद, चुनाव और भाषणों में नहीं होता। लोकतंत्र हमारे व्यवहार में भी दिखाई देता है।
उसने रिया से कहा, “शायद हम रक्षाबंधन को ही अधूरा समझते रहे हैं।”
“कैसे?” रिया ने पूछा।
राहुल बोला, “रक्षा का मतलब सिर्फ यह नहीं कि भाई अपनी बहन की रक्षा करे। असली रक्षा तब होगी, जब हमारा समाज ऐसा बने जहाँ किसी लड़की को सुरक्षित रहने के लिए किसी भाई की जरूरत न पड़े। उसे अपनी पढ़ाई, नौकरी, शादी और जीवन के फैसले खुद लेने का अधिकार मिले। उसे बराबरी मिले, सम्मान मिले और न्याय के लिए किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े।”
रिया कुछ देर तक उसे देखती रही।
फिर उसने राखी उठाई और राहुल की कलाई पर बाँधते हुए कहा-“तो इस बार मैं तुमसे यह वचन नहीं ले रही कि तुम मेरी रक्षा करोगे।”
राहुल ने पूछा, “फिर?”
रिया ने कहा-“वचन दो कि जहाँ भी अन्याय देखोगे, वहाँ चुप नहीं रहोगे।”
राहुल कुछ क्षण शांत रहा। उसे लगा, जैसे आज पहली बार राखी का अर्थ उसकी कलाई से निकलकर संविधान के पन्नों तक पहुँच गया हो।
उसने बहन से कहा, “मैं वादा करता हूँ।”
उस दिन राहुल ने राखी की तस्वीर सोशल मीडिया पर डालने के बजाय अपने कुछ दोस्तों के साथ एक छोटा-सा प्रयास शुरू किया। उन्होंने मोहल्ले की उन लड़कियों को शाम के समय पढ़ाना शुरू किया, जिनकी पढ़ाई आर्थिक कठिनाइयों के कारण छूटने वाली थी।
कुछ लोगों ने मजाक उड़ाया।
एक व्यक्ति ने कहा, “क्या एक राखी से समाज बदल जाएगा?”
राहुल मुस्कुराया और बोला-
“एक राखी से नहीं, लेकिन एक सोच से जरूर बदल सकता है। और सोच तभी बदलती है, जब त्योहार की भावना हमारे व्यवहार का हिस्सा बन जाए।”
शायद रक्षाबंधन का असली अर्थ यही है।
आज हम राखी बाँधते हैं, मिठाई खिलाते हैं और एक-दूसरे की रक्षा का वचन देते हैं। लेकिन लोकतांत्रिक समाज में सबसे बड़ी सुरक्षा किसी एक व्यक्ति की ताकत नहीं, बल्कि समान अधिकार, न्याय और कानून पर भरोसा है।
इस रक्षाबंधन पर हमें अपने आप से एक सवाल जरूर पूछना चाहिए—क्या हम सचमुच ऐसा समाज बना पा रहे हैं, जहाँ हमारी बहनों और बेटियों को सम्मान और सुरक्षा के लिए किसी भाई, पिता या किसी ताकतवर व्यक्ति के सहारे की जरूरत न पड़े?
जहाँ उनकी सुरक्षा किसी की जिम्मेदारी भर न हो, बल्कि उनका अधिकार हो; जहाँ सम्मान किसी रिश्ते की वजह से नहीं, बल्कि इंसान होने के नाते मिले।
अगर हम अभी भी ऐसा समाज नहीं बना पाए हैं, तो शायद हमारी कलाई पर बंधी राखी तो पूरी है, लेकिन रक्षाबंधन का संकल्प अभी अधूरा है।
राखी का धागा सिर्फ भाई-बहन की कलाई पर नहीं बंधता, वह हमें अपने रिश्तों की जिम्मेदारी का एहसास भी कराता है। और यही एहसास जब पूरे समाज तक पहुँचता है, तो एक बेहतर समाज की नींव रखता है-ऐसा समाज जहाँ किसी की सुरक्षा किसी रिश्ते पर निर्भर न हो, किसी के अधिकार किसी की कृपा से न मिलें और हर व्यक्ति को सम्मान के साथ जीने का समान अवसर मिले।
शायद रक्षाबंधन का सबसे बड़ा संदेश भी यही है—रक्षा केवल अपनों की नहीं, उस सोच की भी होनी चाहिए जो समानता, न्याय और सम्मान पर आधारित समाज बनाती है।
ईसा शमीम
निदेशक, क्रेसेंट इंटरनेशनल स्कूल
अध्यक्ष, लायंस क्लब ऑफ गोबिंदपुर
शोधार्थी, आईआईटी-पटना
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