
सरायकेला : चांडिल डैम बहुउद्देशीय परियोजना 22हजार हेक्टेयर जमीन में जलाशय से सटे मैसाड़ा और कालीचामदा गांव पिछले 20 दिनों से जंगली हाथी के आतंक के साये में जी रहे हैं। ग्रामीण और जनप्रतिनिधि वन विभाग पर हाथी भगाने का दबाव बना रहे हैं। चांडिल वन विभाग की QRT टीम रोज गांव पहुंच रही है, रातभर हाथी को खदेड़ने की कोशिश करती है, लेकिन नतीजा सिफर।
सवाल उठ रहा है – हाथी समस्या का असली जिम्मेदार कौन है? वन विभाग या चांडिल डैम बनाने वाली स्वर्णरेखा परियोजना?

वन विभाग के अनुसार, दलमा वन्य प्राणी आश्रयणी की गज परियोजना में भोजन-पानी की कमी के कारण हाथियों के झुंड पलायन कर चांडिल वन क्षेत्र के चारों प्रखंडों के छोटे-बड़े जंगलों में डेरा डाल रहे हैं। शाम ढलते ही झुंड गांवों में घुसकर घरों को टारगेट कर तोड़फोड़ करता है, अनाज खा जाता है।

चांडिल डैम और जलाशय क्षेत्र में हाथियों को भरपूर भोजन और पानी मिल रहा है। इसलिए एक बार भगाने के बाद भी हाथी बार-बार उसी इलाके में लौट आते हैं।
*QRT टीम की नाकाम कोशिश* पिछले दिनों वन विभाग ने दो-दो QRT टीम लगाई। पूरी रात हाथी को खदेड़ते हुए “ईचागढ़ पुराना थाना बोर्डिंग स्कूल”तक पहुंचाया गया। सैकड़ों ग्रामीण भी QRT टीम का साथ दे रहे थे। लेकिन रात दो बजे के करीब, ईचागढ़ में एक युवक के अति उत्साह में नहर पार कराते वक्त हाथी रास्ता भटक गया और फिर मैसाड़ा गांव लौट गया।
इस पूरे अभियान में स्थानीय वनरक्षी और वनपाल भी QRT टीम के साथ मौजूद रहे। वन विभाग का कहना है कि बहुत दूर ले जाने के बाद भी हाथी उसी जगह लौट आ रहा है।
*असली सवाल: स्वर्णरेखा परियोजना की जिम्मेदारी क्या?*
स्थानीय लोगों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि हाथी समस्या की जड़ वन विभाग नहीं, चांडिल डैम है। डैम बनने से हाथियों का प्राकृतिक कॉरिडोर और आवास नष्ट हुआ। विस्थापित क्षेत्रों में मानव-हाथी संघर्ष बढ़ा।
आंकड़े बताते हैं कि टाटा कंपनी स्वर्णरेखा परियोजना को पानी के एवज में हर महीने 8 करोड़ रुपये देती है। इसके बावजूद परियोजना द्वारा विस्थापित और प्रभावित क्षेत्रों में हाथी समस्या के समाधान या कल्याण के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किया जा रहा।
*ग्रामीणों का गुस्सा, घेराव पर सवाल* हाथी से परेशान कुछ ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों ने शुक्रवार को चांडिल वन क्षेत्र पदाधिकारी कार्यालय का घेराव किया। लेकिन सवाल उठ रहा है – जब समस्या की जड़ डैम और परियोजना है, तो क्या उसी तरह *स्वर्णरेखा परियोजना कार्यालय* का घेराव होगा?
वन विभाग का पक्ष है कि डैम बनने के बाद से ही वह लगातार ग्रामीणों को हाथी समस्या से निजात दिलाने का प्रयास कर रहा है। सीमित संसाधनों के बावजूद QRT टीम, पटाखे, टॉर्च से हाथी भगाने की कोशिश जारी है।
*पूछता है ईचागढ़:*
1. अगर डैम के कारण हाथियों का रूट बदला और गांवों में घुसपैठ बढ़ी, तो समाधान की जिम्मेदारी सिर्फ वन विभाग की क्यों?
2. 8 करोड़ राजस्व लेने वाली स्वर्णरेखा परियोजना विस्थापित क्षेत्र में हाथी-मानव संघर्ष रोकने के लिए क्या कर रही है?
3. क्या ग्रामीण और जनप्रतिनिधि परियोजना प्रबंधन से भी उसी सख्ती से जवाब मांगेंगे, जैसे वन विभाग से मांग रहे हैं?
हाथी लौट-लौट कर आ रहा है क्योंकि डैम क्षेत्र में उसे पानी और भोजन दोनों मिल रहा है। जब तक मूल कारण – आवास की क्षति और वैकल्पिक कॉरिडोर – पर काम नहीं होगा, तब तक QRT टीम की मेहनत बेअसर रहेगी। अब ईचागढ़ पूछ रहा है – *असली जिम्मेदार पर उंगली कब उठेगी?*
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